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याद ए इमाम हुसैन :जब अंगारे बन जाते हैं फूल

चित्रकूट। राजा यजीद की क्रूरता की कहानी एक बार फिर दोहराई गई। कौम की सलामती के लिये संघर्ष करने वाले इमाम हुसैन को याद कर अकीकतमंदों ने जलने की परवाह न करते हुये अंगारों को फूलों की मानिंद हवा में उछाला। कर्वी के साथ ही तरौंहा, सीतापुर, बरगढ़, मानिकपुर, मऊ के आसपास के क्षेत्रों में इस तरह के मजमें को देखने के लिये रात भर लोग सड़कों पर रहे। मुख्यालय के पुरानी बाजार में ही लगभग आधा दर्जन इमाम बाड़ों के बाहर इस तरह के दृश्य नंगी आंखों के गवाह बने। रविवार देर रात से शुरु हुआ यह मातमी अलम अलसुबह तक जारी रहा। रात एक बजे के बाद अलावों में आग लगा दी गई। अकीकतमंद नहा धोकर मातमी ढोल और ताशों की आवाजों के साथ इमाम बाडों से निकले और हजारों के हुजूम के सामने जलती हुई आग में अपने जौहर दिखाने के लिये कूद पड़े। सांसद आरके पटेल बांदा से मुहर्रम मिलकर जैसे ही कर्वी आये। पुरानी बाजार चौराहे पर बज रहे मातमी ढोल की आवाजों से खुद को अलग नही कर पाये। उन्होंने मुस्लिम समुदाय के लोगों को बधाई भी दी। जियारत करने के लिये लोग टूट पड़े अलाव के बाद इमाम बाड़ों से निकले ताजियों को देखने के लिये लोग टूट पड़े। कर्...

बीता वर्ष:सड़क पर कराहती रही गर्भवती महिलायें

चित्रकूट। भले ही स्वास्थ्य मंत्रालय हो हल्ला मचाकर परिवार कल्याण के कार्यक्रमों की रीढ़ नसबंदी के साथ ही गर्भनिरोधकों के प्रयोग को मुख्य मानकर जनसंख्या नियंत्रण के प्रयास में लगा हो। वहीं दूसरी तरफ सुरक्षित मातृत्व के लिये जननी सुरक्षा योजना के तहत गर्भवती माता को स्वास्थ्य केंद्रो पर प्रसव के लिये पैसे भी देता हो पर सरकारी अस्पतालों में चलने वाला यह कार्य अलग ही शक्ल में दिखाई देता रहा। गर्भवती मातायें सड़कों, अस्पताल के गेट पर कराहती बच्चा जनती रहीं और उनकी कराहें जिम्मेदारों के कान तक नही पहुंची। इस साल तो जनसंख्या को घटाने के ज्यादा से ज्यादा प्रयास स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी जनसंख्या को बढ़ाते दिखे। गौरतलब है कि सरकारी आंकड़े वर्ष 2001 में जिले की चित्रकूट। भले ही स्वास्थ्य मंत्रालय हो हल्ला मचाकर परिवार कल्याण के कार्यक्रमों की रीढ़ नसबंदी के साथ ही गर्भनिरोधकों के प्रयोग को मुख्य मानकर जनसंख्या नियंत्रण के प्रयास में लगा हो। वहीं दूसरी तरफ सुरक्षित मातृत्व के लिये जननी सुरक्षा योजना के तहत गर्भवती माता को स्वास्थ्य केंद्रो पर प्रसव के लिये पैसे भी देता हो पर सरकारी अस्पतालों मे...

नये साल में मिल जायें और भी महिला चिकित्सक

चित्रकूट। साल भर प्रसव पीड़ा को लेकर महिलायें अस्पतालों की दस्तक तो देती रही पर उन्हें अपना इलाज पूरी तरह से कहीं नही मिला यह बात दीगर है कि कभी स्थानांतरित होती चिकित्सकों के कारण तो कभी हालिया बनाये गये मेडिकल केयर यूनिट में तैनात महिला चिकित्सकों की झिड़कियों के कारण उनकी परेशानियां बढ़ती ही रही। स्वास्थ्य महकमें के लिये आने वाला साल एक्सीडेंटल मरीजों के साथ ही महिलाओं के लिये खास होगा क्योंकि अभी आबादी व बीमारी के हिसाब से महिला चिकित्सकों की संख्या जिले में काफी कम है। जिसके कारण महिलाओं को भारी दिक्कतें हैं। गौरतलब है कि कभी जिला संयुक्त चिकित्सालय में ही महिला चिकित्सालय भी संचालित किया गया था। पुराने जिला अस्पताल की बिल्डिंग में काफी जगह खाली होने के कारण पूर्व सीएमओ डा. आरके निरंजन ने काफी प्रयास कर मेडिकल केयर यूनिट की स्थापना करवाकर यहां पर महिलाओं के लिये अस्पताल खुलवा दिया था। इसके बाद यहां पर कुछ महिला डाक्टरों की नियुक्ति हुई। तीन महिला डाक्टरों में से एक भी महिला डाक्टर पूर्ण कालिक नियुक्त नही हुई। स्वास्थ्य महकमे के काफी प्रयासों के बाद तीन डाक्टर संविदा पर मिली। जिनम...

मानव बने रहना ही सबसे बड़ा पुरस्कार

चित्रकूट। भले ही गुजरता वक्त किसी की परवाह न करे और हौले हौले 2009 के कदम 2010 तक पहुंच गये हो पर नयी उम्मीदों का यह साल हर अच्छा काम करने वाले व्यक्ति के जीवन में वह क्षण लाये जो उसे आनंदित कर सकें। समाज के हितों में काम करने वाले अधिकतर लोगों के यही विचार हैं। महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. ज्ञानेन्द्र सिंह ने इस अलौकिक स्थान को विश्व पटल पर स्थापित करने के उद्देश्य से एक बड़ा कदम उठाया है। यूनिवर्सिटी आफ थर्ड एज की ओर से यहां फरवरी माह में होने वाले कार्यक्रम में लगभग सौ देशों के विद्वान जुटेंगे। इससे जहां यहां के पर्यटन को बढ़ावा मिलने की दिशा में काफी सार्थक प्रयास होंगे वहीं चित्रकूट का नाम ग्लोबल स्तर पर और ज्यादा ख्याति अर्जित करेगा। भागवत कथा आचार्य नवलेश दीक्षित कहते हैं कि हर व्यक्ति को एक लक्ष्य बना कर ही योजनाबद्ध तरीके से काम करना चाहिये। लक्ष्यहीन व्यक्ति को कभी सफलता नही मिलती है। शिक्षा, खेल और समाजसेवा के क्षेत्र में काम करने वालों को पहचान कर पुरस्कार देना मानवता है। शिक्षक आनंद राव तैलंग कहते हैं कि हर विद्यार्थी अपने जीवन के चरमोत...

बुंदेलखंडी संगीत को आगे ले जाने की ख्वाहिश

चित्रकूट। इंडियन आइडियल के टाप टेन में पहुंचकर बुंदेलखंड का नाम रोशन कर चुके गायक कुलदीप सिंह चौहान का मानना है कि शास्त्रीय संगीत ही संगीत की जड़ है। बगैर इसके किसी भी विधा में गाया जाने वाला गीत सफल हो ही नहीं सकता। जिस संगीत में अपने घरों की खुशबू न हो उसका मतलब भी कुछ नही होता। इसलिए अब वे बुंदेलखंड के संगीत को विश्व स्तर पर ले जाने का प्रयास करेंगे। मंगलवार को एक कार्यक्रम में आये बांदा निवासी कुलदीप सिंह चौहान ने बातचीत में कहा कि बढ़ती पश्चिमी सभ्यता के चलते पाश्चात्य संगीत हावी होता जा रहा है। आधुनिक पीढ़ी इसे ज्यादा पसंद करती है परंतु यह शौक स्थायी नहीं होता। किसी भी गायक व संगीतकार को शास्त्रीय संगीत की मदद लेनी ही पड़ती है। शास्त्रीय संगीत किसी भी संगीत की प्राइमरी पाठशाला है। बगैर इसमें पढ़े कोई भी तरक्की नहीं कर सकता। कुलदीप ने बताया कि वह संगीत में पीएचडी करने के बाद बुंदेलखंड के गीत संगीत को विश्व स्तर पर लोकप्रिय बनाने के लिए काम करेंगे।

सूर्य का उपहार

चित्रकूट के पास एक जगह है सूरज कुंड, जहां लोग साधना करने जाते हैं। एक समय की बात है। महर्षि भगुनंदनजमदग्निधनुष-बाण से खेल रहे थे। वे किसी खाली स्थान पर बार-बार बाण चला रहे थे। उनकी पत्नी रेणुका बार-बार बाण लाकर दे रही थीं, लेकिन जेठ माह के तपते सूर्य ने उन्हें परेशान कर दिया। इस वजह से उन्हें बाण लाने में देरी भी हो जाती। महर्षि ने उनसे इसकी वजह पूछी। उन्होंने जवाब दिया कि सूर्य की तेज रोशनी न केवल हमारे सिर को तपा रही है, बल्कि पैर भी जला रही है। इतना सुनते ही महर्षि क्रोधित हो गए और कहा-देवी जिस सूर्य ने तुम्हें कष्ट पहुंचाया, उसे मैं अपने अग्निअस्त्र से गिरा दूंगा। जैसे ही उन्होंने धनुष पर बाण चढाया, भयभीत होकर भगवान सूर्य ने ब्राह्मण का वेश धारण कर लिया और उनके सामने प्रकट हो गए। उन्होंने उनसे विनती की कि मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया है। साथ ही, उन्होंने एक जोडी पादुका और एक छत्र महर्षि को उपहार स्वरूप प्रदान कर दिए। उन्होंने कहा कि यह छत्र सिर पर पडने वाली किरणों से आपका बचाव करेगा और पादुकाएं तपती जमीन पर पैर रखने में सहायता करेंगे। मान्यता है कि यह घटना चित्रकूट से दस किलोमीटर...

..यहीं पर लिखा गया था अयोध्या कांड

 चित्रकूट [संदीप रिछारिया]। आज का 'रामबोला' कल गोस्वामी तुलसीदास बन श्री राम कथा का अमर गायक बन पूरे विश्व में आदर का पात्र बन जायेगा, यह राजापुर के निवासियों ने कभी सोचा भी न था। यह बात और थी कि यह विलक्षण योगी स्वामी नरहरिदास को राजापुर के ही समीप हरिपुर के पास एक पेड़ के नीचे मिल गया और वे उसे उठाकर अपने साथ ले गये। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नाम व उनकी महिमा से परिचित कराने के साथ ही उन्होंने राम बोला को संस्कार व काशी ले जाकर शिक्षा दी तब वह गोस्वामी तुलसीदास बन सके। तुलसी पीठाधीश्वर जगतगुरु स्वामी रामभद्राचार्य बताते हैं कि वैसे तो संत तुलसीदास चित्रकूट में अपने गुरु स्थान नरहरिदास आश्रम पर कई वर्षो तक रहे और यहां पर उन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम राम व भ्राता लक्ष्मण के दो बार साक्षात् दर्शन भी किये। उन्होंने यहीं पर रहकर रामचरित मानस का पूरा अयोध्या कांड व विनय पत्रिका पूर्वाद्ध भी लिखा। अभी तक ज्यादातर लोग सिर्फ यही जानते हैं कि तुलसीदास की हस्तलिखित रामचरित मानस की प्रति सिर्फ राजापुर में है पर इस दुर्लभ प्रति को चित्रकूट परिक्रमा मार्ग स्थित नरहरिदास आश्रम में देखा जा सक...

चित्रकूट : सुबह...सुबह

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चित्रकूट : सुबह...सुबह...

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चित्रकूट : सुबह...सुबह ...

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स्वर्ग से आयी स्वर्ण गंगा है मंदाकिनी

May 27, 02:08 am चित्रकूट। चित्रकूट की धरती के गौरव राम का परिचय परमात्मा राम के रूप में आम आदमी से परिचय कराने वाले गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी अमर कृति श्री राम चरित मानस में जब यह पंक्तियां लिखी थी तभी उनके पास इस बात के पूरे प्रमाण मौजूद थे कि यह मां अनुसुइया के दस हजार सालों के कठोर तप से निकली मंदाकिनी कोई साधारण नदी नही हैं। मां मंदाकिनी की स्तुतियां हर एक वेद में हैं मिलती है। यह तो सीधे स्वर्ग से अवतरित होकर आई स्वर्ण गंगा है। मंदाकिनी के स्वर्ण गंगा होने की पुष्टि श्री मद् भागवत के पंचम स्कंध में हो जाती है। उनके अनुसार जब राजा बलि तीन पग पृथ्वी नाप रहे थे तो उनका बायां पैर स्वर्ग पहुंच गया और उस पैर की स्वर्ण रज को तरल रूप में सृष्टि के निर्माता प्रजापति ब्रह्मा ने अपने कमंडल में ले लिया। इसकी तीन धारायें बनी। पहली गंगा दूसरी भागीरथी और तीसरी मंदाकिनी। यह तीनों नदियां तीनों भुवनों से प्रकट की गई। स्वर्ग से मंदाकिनी, पृथ्वी से गंगा तो पाताल से प्रभावती प्रकट हुई। राजा भागीरथ ने भागीरथ प्रयास कर गंगा को अपने पूर्वजों को तारने के लिये अवतरित कराया तो प्रभावती भूलोक में भागीरथी के...

चिलचिलाती धूप में श्रद्धालुओं ने मंदाकिनी में लगाई डुबकी

May 25, 02:18 am चित्रकूट। चिलचिलाती धूप भी श्रद्धालुओं की आस्था डिगा न सकी। ज्येष्ठ मास की अमावस्या के मौके पर लाखों श्रद्धालुओं ने मंदाकिनी में डुबकी लगायी और फिर भगवान मत्स्यगजयेंद्र नाथ का जलाभिषेक कर भगवान कामतानाथ की परिक्रमा की। वट सावित्री अमावस्या होने से सुहागिनों ने अपने पति के दीर्घायु की कामना के साथ वट वृक्ष की पूजा अर्चना की। भीषण गर्मी के बावजूद अमावस्या में पूरे दिन श्रद्धालुओं की भीड़ धर्मनगरी में दिखी। दोपहर में परिक्रमा मार्ग में कुछ कम भीड़ दिखी, परंतु शाम होते ही श्रद्धालुओं का फिर से तांता लग गया। सैकड़ों लोगों ने लेटी परिक्रमा भी की। रामघाट के बाद कामतानाथ प्रमुख द्वार में भीड़ का सर्वाधिक दबाव देखा गया। परिक्रमा करने के बाद श्रद्धालुओं ने हनुमान धारा, स्फटिक शिला, सती अनुसूइया व गुप्त गोदावरी पहुंचकर दर्शन किये। परिक्रमा मार्ग व मेला क्षेत्र में प्रशासन ने पेयजल व्यवस्था की थी। हालांकि मुख्यालय के बस स्टैड व शिवरामपुर रेलवे स्टेशन पर यात्री पानी के लिये भटकते दिखे। कर्वी रेलवे स्टेशन में श्रीनाथ सेवा समिति ने यात्रियों को पेयजल पिलाया। जिसमें डा. प्रकाश दीनानाथ, आन...

रावण के वंशजों ने किया लंकेश का श्राद्ध

जोधपुर। जोधपुर शहर में लंकाधिपति रावण के वंशजों ने बुधवार को श्राद्ध पक्ष की दशमी को रावण का श्राद्ध किया तथा अमरनाथ मंदिर परिसर में उसकी मूर्ति की विशेष पूजा अर्चना की। अक्षय ज्योति अनुसंधान केंद्र के सचिव अजय दवेके अनुसार दवे,गोधा एवं श्रीमाली समाज के लोगों ने गत वर्ष स्थापित रावण मंदिर में पूजा-अर्चना की तथा बाद में हमेकरणनाडी पर तर्पण एवं पिंडदान किया। इसके बाद रावण की प्रतिमा एवं उसकी कुलदेवीमां खारानाको खीर, पूडी का भोग लगाया तथा ब्राह्माणों को भोजन कराया। उन्होंने बताया कि श्रीलंका में राम-रावण युद्ध में रावण के मारे जाने पर उसके वंशज यहां जोधपुर आकर बस गए थे और ये लोग रावण को प्रकांड पंडित एवं विद्वान मानते हुए उसमें अटूट आस्था रखते हैं। हर साल रावण का श्राद्ध भी किया जाता हैं। दशहरा के पर्व पर जहां खुशी मनाई जाती हैं तथा रावण दहन किया जाता हैं वहीं हमारे समाज के लोग इस दिन को सूतक मानते हुए स्नान करते हैं। श्री दवेने कहा कि लंकाधिपति की सुसराल भी जोधपुर मानी जाती हैं तथा उनकी रानी मंदोदरी का संबंध यहां की राजधानी मंडोरसे माना जाता हैं। उन्होंने कहा कि रावण के प्रति इसी आस्था क...

दक्षिण-पूर्व एशिया के मुस्लिम देशों में रची बसी है रामकथा

नई दिल्ली। भारतीय संस्कृति के प्राणाधरभगवान राम दक्षिण-पूर्व एशिया के मुस्लिम देशों की संस्कृति में भी रचे बसे हैं। वहां रामकथा विभिन्न रूपों में प्रचलित है और लोकजीवनसे इतनी गहराई तक जुडी हुई है कि वह उनकी संस्कृति का अभिन्न अंग बन गई है। दक्षिण-पूर्व एशिया में रामकथा विषय पर शोध कार्य कर रहे साहित्य के सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से अलंकृत संस्कृत के प्रकांड विद्वान प्रोफेसर डा. सत्यव्रतशास्त्री ने दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में रामकथा के विभिन्न प्रचलित रूपों, उसके विविध आयामों तथा वहां की लोक संस्कृति में रामायण के महत्व पर यहां विस्तार से बातचीत की। उन्होंने बताया कि म्यांमार, थाइलैंड, मलेशिया, कम्बोडिया, लाओसआदि देशों में रामकथा विभिन्न नामों से प्रचलित है। थाइलैंड में इसे रामकियनअर्थात् रामकीर्ति,कम्बोडिया में रामकेररामकथा, म्यांमार में रामवत्थुरामवस्तुऔर रामाथग्गियन,मलेशिया में हेकायतश्रीराम श्रीराम कथा तथा लाओसमें फ्रलकफ्ररामयानी श्री लक्ष्मण-श्रीराम कहा जाता है। सभी उदात्तपात्रों के नाम के आगे फ्रयानीश्री लगाना आवश्यक होता है। जैसे फ्रआतिथआदित्य, फ्रचानश्रीचंद्र। इसी तरह...

छह महीने रहें चित्रकूट

विंध्यपर्वत के उत्तर में है चित्रकूट धाम। यह न केवल एक धार्मिक स्थान है, बल्कि अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के कारण भी काफी चर्चित है। आध्यात्मिक शांति :चित्रकूट पर्वत मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश, दोनों राज्यों की सीमाओं को घेरता है। वनवास के दौरान भगवान राम ने अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ सबसे अधिक समय तक यहीं निवास किया था। यात्रियों को चित्रकूट गिरि, स्फटिक शिला, भरत कूप, चित्रकूट-वन, गुप्त गोदावरी,मंदाकिनी [पयस्विनी] की यात्रा करने से आध्यात्मिक शांति मिलती है। चित्रकूट गिरि को कामद गिरि भी कहते हैं, क्योंकि इस पर्वत को राम की कृपा प्राप्त हुई थी। राम-भक्तों का विश्वास है कि कामद गिरि के दर्शन मात्र से दुख समाप्त हो जाते हैं। इसका एक और नाम कामतानाथभी है। अनुसूइयाकी तपोभूमि :चित्रकूट में पयस्विनी नदी है, जिसे मंदाकिनी भी कहते हैं। इसी के किनारे स्फटिक शिला पर बैठ कर राम ने मानव रूप में कई लीलाएं कीं। इसी स्थान पर राम ने फूलों से बने आभूषण से सीता को सजाया था। पयस्विनी के बायीं ओर प्रमोद वन है, जिससे आगे जानकी कुंड है। यहां स्थित अनुसूइयाआश्रम महर्षि अत्रि और उनकी पत्नी अनुसूइयाकी...

सुनामी को थाम लेता है रामसेतु

इसे विचित्र संयोग ही कहेंगे। रामसेतु बचाने के लिए देश भर में चला आंदोलन बुधवार के दिन में सबसे बड़ी खबर बना। शाम होते-होते दूसरी खबर ने बड़ी खबर का रूप धर लिया। इंडोनेशिया में भयावह भूकंप। इसके बाद भारतीय गृह मंत्रालय का रेड अलर्ट जारी करना। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में सुनामी आने की चेतावनी। पहली नज़र में अलग-अलग-सी दिखने वाली दोनों खबरों में अंतर्सबंध है। इसके लिए वैज्ञानिकों द्वारा दी गई चेतावनियों को धैर्य और ध्यान से समझना होगा। बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के बीच शार्टकट समुद्री रास्ता तैयार करने की योजना का नाम है सेतुसमुद्रम परियोजना। इस परियोजना पर अमल तभी हो सकेगा जब रामसेतु (एडम ब्रिज) के बीच का 300 मीटर का हिस्सा तोड़ा जाए। रामसेतु सेतुसमुद्रम परियोजना के बीच में पड़ता है। इसी रामसेतु को बचाने के लिए आंदोलन चल रहा है। इसी रामसेतु ने वर्ष 2004 में सुनामी लहरों के छक्के छुड़ाए थे। हजारों लोगों की जान बचाई थी। विश्वास न हो तो अंतरराष्ट्रीय सुनामी सोसायटी के अध्यक्ष और भारतीय सरकार के सुनामी सलाहकार सत्यम मूर्ति की जुबानी सुनिए- 'दिसंबर 2004 की उस काली सुबह भारत और श्रीलंका के ...

5114 ईसापूर्व 10 जनवरी को पैदा हुए थे राम

मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की ऐतिहासिकता को चुनौती देनेवालों को चुनौती देता एक शोध सामने आया है , जो सिद्ध करता है कि राम पौराणिक नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व थे। उनका जन्म 5114 ईसापूर्व 10 जनवरी को हुआ था। इस तरह अगली 10 जनवरी को राम के जन्म के 7122 साल पूरे हो जाएंगे। श्री राम के बारे में यह शोध चेन्नई की एक गैरसरकारी संस्था भारत ज्ञान द्वारा पिछले छह वर्षो में किया गया है। मुंबई में अनेक वैज्ञानिकों, विद्वानों, व्यवसाय जगत की हस्तियों के सामने इस शोध से संबंधित तथ्यों पर प्रकाश डालते हुए इसके संस्थापक ट्रस्टी डीके हरी ने एक समारोह में बताया कि इस शोध में वाल्मीकि रामायण को मूल आधार मानते हुए अनेक वैज्ञानिक, ऐतिहासिक, भौगोलिक, ज्योतिषीय और पुरातात्विक तथ्यों की मदद ली गई है। जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि राम हमारे गौरवशाली इतिहास का ही एक अंग थे। इस समारोह का आयोजन भारत ज्ञान ने आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर की संस्था आर्ट आफ लिविंग के साथ मिलकर किया था। शोध से संबंधित प्रस्तुतिकरण के बाद इसका सीडी एवं वेबसाइट लांच करते हुए श्री श्री रविशंकर ने कहा कि हमारे देश को ऐसे वै...

रामसेतु तथा राम के युग की प्रामाणिकता

हम भारतीय विश्व की प्राचीनतम सभ्यता के वारिस है तथा हमें अपने गौरवशाली इतिहास तथा उत्कृष्ट प्राचीन संस्कृति पर गर्व होना चाहिए। किंतु दीर्घकाल की परतंत्रता ने हमारे गौरव को इतना गहरा आघात पहुंचाया कि हम अपनी प्राचीन सभ्यता तथा संस्कृति के बारे में खोज करने की तथा उसको समझने की इच्छा ही छोड़ बैठे। परंतु स्वतंत्र भारत में पले तथा पढ़े-लिखे युवक-युवतियां सत्य की खोज करने में समर्थ है तथा छानबीन के आधार पर निर्धारित तथ्यों तथा जीवन मूल्यों को विश्व के आगे गर्वपूर्वक रखने का साहस भी रखते है। श्रीराम द्वारा स्थापित आदर्श हमारी प्राचीन परंपराओं तथा जीवन मूल्यों के अभिन्न अंग है। वास्तव में श्रीराम भारतीयों के रोम-रोम में बसे है। रामसेतु पर उठ रहे तरह-तरह के सवालों से श्रद्धालु जनों की जहां भावना आहत हो रही है,वहीं लोगों में इन प्रश्नों के समाधान की जिज्ञासा भी है। हम इन प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयत्‍‌न करे:- श्रीराम की कहानी प्रथम बार महर्षि वाल्मीकि ने लिखी थी। वाल्मीकि रामायण श्रीराम के अयोध्या में सिंहासनारूढ़ होने के बाद लिखी गई। महर्षि वाल्मीकि एक महान खगोलविद् थे। उन्होंने राम के जीव...

मेरठ से भी 15 साल पहले आजादी की क्रांति का सूत्रपात हुआ था चित्रकूट में

इतिहास की इबारत गवाही देती है कि हिंदुस्तान की आजादी के प्रथम संग्राम की ज्वाला मेरठ की छावनी में भड़की थी। किन्तु इन ऐतिहासिक तथ्यों के पीछे एक सचाई गुम है, वह यह कि आजादी की लड़ाई शुरू करने वाले मेरठ के संग्राम से भी 15 साल पहले बुन्देलखंड की धर्मनगरी चित्रकूट में एक क्रांति का सूत्रपात हुआ था। पवित्र मंदाकिनी के किनारे गोकशी के खिलाफ एकजुट हुई हिंदू-मुस्लिम बिरादरी ने मऊ तहसील में अदालत लगाकर पांच फिरंगी अफसरों को फांसी पर लटका दिया। इसके बाद जब-जब अंग्रेजों या फिर उनके किसी पिछलग्गू ने बुंदेलों की शान में गुस्ताखी का प्रयास किया तो उसका सिर कलम कर दिया गया। इस क्रांति के नायक थे आजादी के प्रथम संग्राम की ज्वाला मेरठ के सीधे-साधे हरबोले। संघर्ष की दास्तां को आगे बढ़ाने में बुर्कानशीं महिलाओं की ‘घाघरा पलटन’ की भी अहम हिस्सेदारी थी।आजादी के संघर्ष की पहली मशाल सुलगाने वाले बुन्देलखंड के रणबांकुरे इतिहास के पन्नों में जगह नहीं पा सके, लेकिन उनकी शूरवीरता की तस्दीक फिरंगी अफसर खुद कर गये हैं। अंग्रेज अधिकारियों द्वारा लिखे बांदा गजट में एक ऐसी कहानी दफन है, जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। गज...

चित्रकूट धाम भारत के सबसे प्राचीन तीर्थस्थलों में एक

मंदाकिनी नदी के किनारे पर बसा चित्रकूट धाम भारत के सबसे प्राचीन तीर्थस्थलों में एक है। उत्तर-प्रदेश में 38.2 वर्ग किमी. के क्षेत्र में फैला शांत और सुन्दर चित्रकूट प्रकृति और ईश्वर की अनुपम देन है। चारों ओर से विन्ध्य पर्वत श्रृंखलाओं और वनों से घिरे चित्रकूट को अनेक आश्चर्यो की पहाड़ी कहा जाता है। मंदाकिनी नदी के किनार बने अनेक घाट और मंदिर में पूरे साल श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। माना जाता है कि भगवान राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ अपने वनवास के चौदह वर्षो में ग्यारह वर्ष चित्रकूट में ही बिताए थे। इसी स्थान पर ऋषि अत्री और सती अनसुइया ने ध्यान लगाया था। ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने चित्रकूट में ही सती अनसुइया के घर जन्म लिया था। कामदगिरी इस पवित्र पर्वत का काफी धार्मिक महत्व है। श्रद्धालु कामदगिरी पर्वत की 5 किमी। की परिक्रमा कर अपनी मनोकामनाएं पूर्ण होने की कामना करते हैं। जंगलों से घिरे इस पर्वत के तल पर अनेक मंदिर बने हुए हैं। चित्रकूट के लोकप्रिय कामतानाथ और भरत मिलाप मंदिर भी यहीं स्थित है। रामघाट मंदाकिनी नदी के तट पर बने रामघाट में अनेक धार्मिक क्रियाकलाप चलते रहते हैं।...

जा पर विपदा परत है, सो आवत यहिदेश।

विंध्यपर्वत के उत्तर में है चित्रकूट धाम। यह न केवल एक धार्मिक स्थान है, बल्कि अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के कारण भी काफी चर्चित है। आध्यात्मिक शांति :चित्रकूट पर्वत मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश, दोनों राज्यों की सीमाओं को घेरता है। वनवास के दौरान भगवान राम ने अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ सबसे अधिक समय तक यहीं निवास किया था। यात्रियों को चित्रकूट गिरि, स्फटिक शिला, भरत कूप, चित्रकूट-वन, गुप्त गोदावरी,मंदाकिनी [पयस्विनी] की यात्रा करने से आध्यात्मिक शांति मिलती है। चित्रकूट गिरि को कामद गिरि भी कहते हैं, क्योंकि इस पर्वत को राम की कृपा प्राप्त हुई थी। राम-भक्तों का विश्वास है कि कामद गिरि के दर्शन मात्र से दुख समाप्त हो जाते हैं। इसका एक और नाम कामतानाथभी है। अनुसूइयाकी तपोभूमि :चित्रकूट में पयस्विनी नदी है, जिसे मंदाकिनी भी कहते हैं। इसी के किनारे स्फटिक शिला पर बैठ कर राम ने मानव रूप में कई लीलाएं कीं। इसी स्थान पर राम ने फूलों से बने आभूषण से सीता को सजाया था। पयस्विनी के बायीं ओर प्रमोद वन है, जिससे आगे जानकी कुंड है। यहां स्थित अनुसूइयाआश्रम महर्षि अत्रि और उनकी पत्नी अनुसूइयाकी...

धर्म-नगरी "चित्रकूट" से सम्बंधित इस ब्लॉग में आपका स्वागत है !

अनेक ऋषि-मुनियों की तपोस्थली और बारह वर्षों तक भगवान श्री राम की कर्म स्थली रही इस विश्व विख्यात नगरी से सम्बंधित इस ब्लॉग में आप सभी पाठको का स्वागत है .भारतीय उपमहाद्वीप के ह्रदय-क्षेत्र में स्थित इस पावन धरा के पौराणिक,ऐतिहासिक,सांस्कृतिक और वर्तमान "सामाजिक-राजनीतिक" महत्व को वैश्विक मंच प्रदान करने की मेरी इस कोशिश में आप सभी का भी सहयोग अपेक्षित है. यदि आपके पास चित्रकूट से सम्बंधित कोई उपयोगी या शोधात्मक प्रकाश्य सामग्री है तो आप हमें जरूर भेजें. साथ ही इस ब्लॉग को और अधिक परिमार्जित स्वरुप प्रदान करने हेतु अपनी राय हमें अवश्य दें . आपका, संदीप रिछारिया email: sandeep.richhariya@gmail.com