मरियम को कंठस्थ है संपूर्ण हनुमान चालीसा, बोलीं—हर व्यक्ति को नित्य करना चाहिए पाठ
रामानन्द मिशन के 11 करोड़ श्रीहनुमान चालीसा पाठानुष्ठान महाभियान से जुड़े विद्यार्थी, सामूहिक पाठ के बाद महाराज जी से किया संवाद
आस्था जब संस्कार बनती है और संस्कार जब संकल्प का रूप लेते हैं, तब नई पीढ़ी के निर्माण की राह प्रशस्त होती है। कुछ ऐसा ही दृश्य राजधानी के मोहन गार्डन स्थित कमल पब्लिक स्कूल में देखने को मिला, जहां श्रीहनुमान चालीसा की पावन चौपाइयों के बीच विद्यार्थियों ने भक्ति, अनुशासन, तर्क, विवेक और जीवन-मूल्यों का पाठ पढ़ा।
पूज्यपाद जगद्गुरु रामानंदाचार्य श्री रामभद्राचार्य जी महाराज के पावन संकल्प से प्रेरित 11 करोड़ श्रीहनुमान चालीसा पाठानुष्ठान महाभियान के अंतर्गत आयोजित इस कार्यक्रम में रामानन्द मिशन ने विद्यार्थियों को भारतीय आध्यात्मिक परंपरा और सांस्कृतिक चेतना से जोड़ने का सार्थक प्रयास किया।
विद्यालय पहुंचे आचार्य रामचन्द्र दास जी महाराज का निदेशक श्री वेद टण्डन जी ने पुष्पगुच्छ, अंगवस्त्र एवं स्मृति-चिह्न भेंट कर आत्मीय स्वागत किया। इसके पश्चात छात्र-छात्राओं, शिक्षकों एवं प्रबंध समिति के सदस्यों ने एक स्वर में 11 बार श्रीहनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ किया। पूरा परिसर ‘जय श्रीराम’ और ‘जय बजरंगबली’ के जयघोष से गुंजायमान हो उठा।
मरियम ने सुनाई संपूर्ण हनुमान चालीसा, संकल्प की शक्ति से अभिभूत हुए विद्यार्थी
कार्यक्रम का एक विशेष प्रसंग उस समय सामने आया, जब छात्रा मरियम ने संपूर्ण श्रीहनुमान चालीसा कंठस्थ सुनाकर अपनी प्रतिभा और निष्ठा का परिचय दिया। मरियम ने कहा कि हनुमान चालीसा के पाठ से मन को शांति और शक्ति मिलती है तथा प्रत्येक व्यक्ति को इसका नित्य पाठ करना चाहिए।
वहीं छात्र सिद्धांत सिंह ने हनुमान जी के चरित्र से मिलने वाली प्रेरणा को अपने शब्दों में व्यक्त करते हुए कहा कि मन में जो संकल्प लिया जाए, उसे पूरा करके दिखाना चाहिए। उनका यह विचार कार्यक्रम के मूल संदेश को रेखांकित करता रहा—दृढ़ संकल्प, निरंतर प्रयास और आत्मविश्वास ही सफलता के आधार हैं।
श्रद्धा और तर्क विरोधी नहीं, एक-दूसरे के पूरक
कार्यक्रम का संवाद सत्र विद्यार्थियों की जिज्ञासा और वैचारिक सक्रियता के कारण विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। छात्र-छात्राओं ने आचार्य रामचन्द्र दास जी महाराज से धर्म, इतिहास, तर्क, श्रद्धा और जीवन-दर्शन से जुड़े प्रश्न पूछे।
कक्षा नौवीं ‘ए’ के छात्र वंश ने प्रश्न किया कि हनुमान चालीसा की रचना कैसे हुई और उसकी पृष्ठभूमि क्या थी? इस पर आचार्य श्री ने गोस्वामी तुलसीदास जी की भक्ति-साधना तथा तत्कालीन सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए हनुमान चालीसा की रचना-परंपरा और उसकी लोकस्वीकृति पर प्रकाश डाला।
कक्षा 12वीं की छात्रा आर्या भारद्वाज ने आज के युवाओं के सामने उपस्थित एक महत्वपूर्ण प्रश्न रखा—तर्क और श्रद्धा के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए?
आचार्य श्री ने समझाया कि तर्क और श्रद्धा परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। तर्क बुद्धि को प्रखर बनाता है और अंधविश्वास से बचने की दृष्टि देता है, जबकि श्रद्धा मन में संबल, विनम्रता और सकारात्मकता का संचार करती है। तर्क से रहित श्रद्धा अंधविश्वास का रूप ले सकती है और श्रद्धा से रहित तर्क जीवन की संवेदनात्मक गहराई खो सकता है। श्रीहनुमान चालीसा का अध्ययन बुद्धि, विवेक, भक्ति और आत्मबल के समन्वय की प्रेरणा देता है।
संवाद के दौरान छात्रा तविक्षा सहित अन्य विद्यार्थियों ने भी उत्साहपूर्वक सहभागिता की। इस सत्र ने स्पष्ट किया कि नई पीढ़ी केवल परंपराओं को जानना ही नहीं चाहती, बल्कि उनके पीछे निहित विचार और जीवन-दर्शन को भी समझना चाहती है।
संस्कारवान युवा ही समर्थ भारत की आधारशिला
विद्यालय के निदेशक श्री वेद टण्डन जी ने रामानन्द मिशन के इस राष्ट्रव्यापी अभियान की सराहना करते हुए कहा कि वर्तमान समय में विद्यार्थियों को आधुनिक तकनीक और शिक्षा के साथ अपने नैतिक मूल्यों तथा सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना आवश्यक है। उन्होंने जगद्गुरु श्री रामभद्राचार्य जी महाराज के 11 करोड़ श्रीहनुमान चालीसा पाठ के संकल्प को युवा पीढ़ी के सर्वांगीण विकास की दिशा में महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पहल बताया।
उल्लेखनीय है कि रामानन्द मिशन द्वारा 12 अक्टूबर 2026 से दिल्ली-एनसीआर के विभिन्न विद्यालयों एवं शिक्षण संस्थानों में यह जनजागरण अभियान संचालित किया जा रहा है। अभियान का उद्देश्य श्रीहनुमान चालीसा के माध्यम से विद्यार्थियों में आत्मबल, अनुशासन, सेवा, राष्ट्रप्रेम और जीवन-मूल्यों के प्रति जागरूकता विकसित करना है।
कार्यक्रम के समापन पर विद्यार्थियों एवं शिक्षकों ने प्रतिदिन श्रीहनुमान चालीसा का पाठ करने, पर्यावरण संरक्षण, अभिभावकों के सम्मान, राष्ट्रप्रेम और सामाजिक उत्तरदायित्व के निर्वहन का संकल्प लिया।
कमल पब्लिक स्कूल का यह आयोजन इस संदेश के साथ संपन्न हुआ कि शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान अर्जित करना नहीं, बल्कि चरित्र का निर्माण भी है। भक्ति यदि विवेक से जुड़े, संस्कार यदि कर्म में उतरें और संकल्प यदि सेवा का माध्यम बनें, तो यही भाव समर्थ समाज और सशक्त राष्ट्र की नींव बनता है।








