Wednesday, October 28, 2026

हनुमान चालीसा के स्वरों से गूंजा कमल पब्लिक स्कूल, भक्ति के साथ तर्क और विवेक का पाठ

मरियम को कंठस्थ है संपूर्ण हनुमान चालीसा, बोलीं—हर व्यक्ति को नित्य करना चाहिए पाठ

रामानन्द मिशन के 11 करोड़ श्रीहनुमान चालीसा पाठानुष्ठान महाभियान से जुड़े विद्यार्थी, सामूहिक पाठ के बाद महाराज जी से किया संवाद

आस्था जब संस्कार बनती है और संस्कार जब संकल्प का रूप लेते हैं, तब नई पीढ़ी के निर्माण की राह प्रशस्त होती है। कुछ ऐसा ही दृश्य राजधानी के मोहन गार्डन स्थित कमल पब्लिक स्कूल में देखने को मिला, जहां श्रीहनुमान चालीसा की पावन चौपाइयों के बीच विद्यार्थियों ने भक्ति, अनुशासन, तर्क, विवेक और जीवन-मूल्यों का पाठ पढ़ा।

पूज्यपाद जगद्गुरु रामानंदाचार्य श्री रामभद्राचार्य जी महाराज के पावन संकल्प से प्रेरित 11 करोड़ श्रीहनुमान चालीसा पाठानुष्ठान महाभियान के अंतर्गत आयोजित इस कार्यक्रम में रामानन्द मिशन ने विद्यार्थियों को भारतीय आध्यात्मिक परंपरा और सांस्कृतिक चेतना से जोड़ने का सार्थक प्रयास किया।

विद्यालय पहुंचे आचार्य रामचन्द्र दास जी महाराज का निदेशक श्री वेद टण्डन जी ने पुष्पगुच्छ, अंगवस्त्र एवं स्मृति-चिह्न भेंट कर आत्मीय स्वागत किया। इसके पश्चात छात्र-छात्राओं, शिक्षकों एवं प्रबंध समिति के सदस्यों ने एक स्वर में 11 बार श्रीहनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ किया। पूरा परिसर ‘जय श्रीराम’ और ‘जय बजरंगबली’ के जयघोष से गुंजायमान हो उठा।

मरियम ने सुनाई संपूर्ण हनुमान चालीसा, संकल्प की शक्ति से अभिभूत हुए विद्यार्थी

कार्यक्रम का एक विशेष प्रसंग उस समय सामने आया, जब छात्रा मरियम ने संपूर्ण श्रीहनुमान चालीसा कंठस्थ सुनाकर अपनी प्रतिभा और निष्ठा का परिचय दिया। मरियम ने कहा कि हनुमान चालीसा के पाठ से मन को शांति और शक्ति मिलती है तथा प्रत्येक व्यक्ति को इसका नित्य पाठ करना चाहिए।

वहीं छात्र सिद्धांत सिंह ने हनुमान जी के चरित्र से मिलने वाली प्रेरणा को अपने शब्दों में व्यक्त करते हुए कहा कि मन में जो संकल्प लिया जाए, उसे पूरा करके दिखाना चाहिए। उनका यह विचार कार्यक्रम के मूल संदेश को रेखांकित करता रहा—दृढ़ संकल्प, निरंतर प्रयास और आत्मविश्वास ही सफलता के आधार हैं।


श्रद्धा और तर्क विरोधी नहीं, एक-दूसरे के पूरक

कार्यक्रम का संवाद सत्र विद्यार्थियों की जिज्ञासा और वैचारिक सक्रियता के कारण विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। छात्र-छात्राओं ने आचार्य रामचन्द्र दास जी महाराज से धर्म, इतिहास, तर्क, श्रद्धा और जीवन-दर्शन से जुड़े प्रश्न पूछे।

कक्षा नौवीं ‘ए’ के छात्र वंश ने प्रश्न किया कि हनुमान चालीसा की रचना कैसे हुई और उसकी पृष्ठभूमि क्या थी? इस पर आचार्य श्री ने गोस्वामी तुलसीदास जी की भक्ति-साधना तथा तत्कालीन सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए हनुमान चालीसा की रचना-परंपरा और उसकी लोकस्वीकृति पर प्रकाश डाला।

कक्षा 12वीं की छात्रा आर्या भारद्वाज ने आज के युवाओं के सामने उपस्थित एक महत्वपूर्ण प्रश्न रखा—तर्क और श्रद्धा के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए?

आचार्य श्री ने समझाया कि तर्क और श्रद्धा परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। तर्क बुद्धि को प्रखर बनाता है और अंधविश्वास से बचने की दृष्टि देता है, जबकि श्रद्धा मन में संबल, विनम्रता और सकारात्मकता का संचार करती है। तर्क से रहित श्रद्धा अंधविश्वास का रूप ले सकती है और श्रद्धा से रहित तर्क जीवन की संवेदनात्मक गहराई खो सकता है। श्रीहनुमान चालीसा का अध्ययन बुद्धि, विवेक, भक्ति और आत्मबल के समन्वय की प्रेरणा देता है।

संवाद के दौरान छात्रा तविक्षा सहित अन्य विद्यार्थियों ने भी उत्साहपूर्वक सहभागिता की। इस सत्र ने स्पष्ट किया कि नई पीढ़ी केवल परंपराओं को जानना ही नहीं चाहती, बल्कि उनके पीछे निहित विचार और जीवन-दर्शन को भी समझना चाहती है।

संस्कारवान युवा ही समर्थ भारत की आधारशिला

विद्यालय के निदेशक श्री वेद टण्डन जी ने रामानन्द मिशन के इस राष्ट्रव्यापी अभियान की सराहना करते हुए कहा कि वर्तमान समय में विद्यार्थियों को आधुनिक तकनीक और शिक्षा के साथ अपने नैतिक मूल्यों तथा सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना आवश्यक है। उन्होंने जगद्गुरु श्री रामभद्राचार्य जी महाराज के 11 करोड़ श्रीहनुमान चालीसा पाठ के संकल्प को युवा पीढ़ी के सर्वांगीण विकास की दिशा में महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पहल बताया।

उल्लेखनीय है कि रामानन्द मिशन द्वारा 12 अक्टूबर 2026 से दिल्ली-एनसीआर के विभिन्न विद्यालयों एवं शिक्षण संस्थानों में यह जनजागरण अभियान संचालित किया जा रहा है। अभियान का उद्देश्य श्रीहनुमान चालीसा के माध्यम से विद्यार्थियों में आत्मबल, अनुशासन, सेवा, राष्ट्रप्रेम और जीवन-मूल्यों के प्रति जागरूकता विकसित करना है।

कार्यक्रम के समापन पर विद्यार्थियों एवं शिक्षकों ने प्रतिदिन श्रीहनुमान चालीसा का पाठ करने, पर्यावरण संरक्षण, अभिभावकों के सम्मान, राष्ट्रप्रेम और सामाजिक उत्तरदायित्व के निर्वहन का संकल्प लिया।

कमल पब्लिक स्कूल का यह आयोजन इस संदेश के साथ संपन्न हुआ कि शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान अर्जित करना नहीं, बल्कि चरित्र का निर्माण भी है। भक्ति यदि विवेक से जुड़े, संस्कार यदि कर्म में उतरें और संकल्प यदि सेवा का माध्यम बनें, तो यही भाव समर्थ समाज और सशक्त राष्ट्र की नींव बनता है।


Sunday, October 25, 2026

महर्षि वाल्मीकि की दुर्लभ कृति ‘अद्भुत रामायण’ की पांडुलिपि मिली, रामकथा के नए प्रसंगों पर खुलेगा शोध का मार्ग

अद्भुद रामायण की हस्त लिखित प्रति




*संवत् 1876 की हस्तलिखित प्रति मिलने का दावा 

*27 सर्गों और 1400 श्लोकों का उल्लेख

*सीता के सहस्र नामों सहित कई विशिष्ट प्रसंगों ने बढ़ाई शोध जगत की उत्सुकता

विशेष संवाददाता

आदिकवि महर्षि वाल्मीकि की रामकथा परंपरा से जुड़ी एक दुर्लभ पांडुलिपि की खोज ने संस्कृत साहित्य और रामायण के शोध की दिशा में नई संभावनाओं को सामने रखा है। प्रसिद्ध शोधकर्ता एवं साहित्यकार डॉ. चन्द्रिका प्रसाद दीक्षित ‘ललित’ के अनुसार, उन्हें महर्षि वाल्मीकि की कृति ‘अद्भुत रामायण’ की संवत् 1876 की एक हस्तलिखित प्रतिलिपि प्राप्त हुई है। इस पांडुलिपि में वर्णित प्रसंग, विशेष रूप से सीताजी के सहस्र नामों का उल्लेख और रामकथा के कुछ विशिष्ट आख्यान, शोध की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताए जा रहे हैं।

इस खोज का महत्व केवल एक प्राचीन ग्रंथ की पांडुलिपि मिलने तक सीमित नहीं है। यह रामायण की विविध परंपराओं, उनमें वर्णित पात्रों के स्वरूप और भारतीय सांस्कृतिक चेतना के अध्ययन को नई सामग्री उपलब्ध करा सकती है। हालांकि, पांडुलिपि की प्रामाणिकता, उसकी लिपि, काल निर्धारण और पाठ की तुलना के आधार पर ही इसके ऐतिहासिक एवं साहित्यिक महत्व का अंतिम आकलन किया जा सकेगा।

रामकथा की समृद्ध परंपरा का महत्वपूर्ण सूत्र

संस्कृत भाषा के आदिकवि महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण भारतीय साहित्य, दर्शन और संस्कृति की आधारभूत कृतियों में गिनी जाती है। इसकी प्रेरणा से देश के विभिन्न क्षेत्रों और भाषाओं में रामकथा की अनेक धाराएं विकसित हुईं। हिंदी में गोस्वामी तुलसीदास की ‘रामचरितमानस’ सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं में रामायण परंपरा ने साहित्य और लोकजीवन को गहराई से प्रभावित किया।

महर्षि वाल्मीकि की परंपरा में भगवती सीता को आश्रय देने और लव-कुश को रामकथा का गायन सिखाने का प्रसंग विशेष महत्व रखता है। सीता के चरित्र, उनके आत्मसम्मान, धैर्य और मातृत्व को भारतीय साहित्य में विशिष्ट स्थान प्राप्त है। ‘सीतायाः चरितं महत्’ की अवधारणा भी इसी व्यापक सांस्कृतिक विमर्श से जुड़ी हुई है।

सीता के सहस्र नामों का उल्लेख बना विशेष आकर्षण

डॉ. दीक्षित के अनुसार, प्राप्त पांडुलिपि में कुल 27 सर्ग और लगभग 1400 श्लोक बताए गए हैं। इसमें एक सर्ग में सीताजी के सहस्र नामों का उल्लेख होने की बात कही गई है। यह विशेषता पाठ की तुलना और अन्य रामायणों तथा संबंधित धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकती है।

पांडुलिपि में सीता की उत्पत्ति, शिव के वरदान,राजयोग , रावण की सैन्य शक्ति, राम और रावण पक्ष के संघर्ष, सैन्य विन्यास तथा युद्ध संबंधी प्रसंगों का भी उल्लेख होने की जानकारी दी गई है। इन कथाओं का व्यवस्थित अध्ययन रामकथा के विविध पाठों में उपलब्ध समानताओं और भिन्नताओं को समझने में सहायक हो सकता है।

प्राचीन हस्तलिखित प्रति के संरक्षण और अध्ययन की जरूरत

बताया गया है कि यह प्रतिलिपि प्राचीन कागज पर काली स्याही से हस्तलिखित है और इसका आकार लगभग 12 × 6 सेंटीमीटर है। इसके संवत् 1876 की प्रति होने की जानकारी भी दी गई है। पांडुलिपि के वास्तविक काल, लेखन शैली, लिपि, कागज और पाठ की पुष्टि के लिए विशेषज्ञों द्वारा पांडुलिपि विज्ञान तथा संस्कृत पाठलोचन की विधियों से परीक्षण आवश्यक होगा।

यदि इस प्रति के विवरण और पाठ की स्वतंत्र रूप से पुष्टि होती है, तो यह संस्कृत साहित्य, रामायण परंपरा और भारतीय सांस्कृतिक इतिहास के अध्येताओं के लिए उपयोगी शोध सामग्री साबित हो सकती है। इसके संरक्षण, उच्च गुणवत्ता वाले डिजिटलीकरण और प्रामाणिक संस्करण के प्रकाशन से इस सामग्री को व्यापक शोध जगत तक पहुंचाया जा सकेगा।

साहित्यिक अनुसंधान की दिशा में महत्वपूर्ण पहल

संस्कृत साहित्य के विद्वानों डॉ. गया प्रसाद त्रिपाठी और डॉ. ललित दीक्षित के शोध कार्यों का उल्लेख करते हुए इस खोज को प्राचीन साहित्य के अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया गया है। महर्षि वाल्मीकि की कृतियों और रामकथा की विविध परंपराओं पर शोध भारतीय साहित्यिक विरासत को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।

महर्षि वाल्मीकि की जयंती के अवसर पर सामने आई इस जानकारी ने प्राचीन ग्रंथों और दुर्लभ पांडुलिपियों की खोज, संरक्षण तथा वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता को फिर रेखांकित किया है। ऐसी पांडुलिपियां केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भारतीय साहित्य, संस्कृति और विचार परंपरा को समझने के महत्वपूर्ण स्रोत भी हैं।




Saturday, September 26, 2026

बरसात में 84 कोस श्री चित्रकूट धाम का अद्भुत रूप

झरनों की कल-कल, पहाड़ों की हरियाली और बादलों की चादर… प्रकृति ने सजाया चित्रकूट का अनुपम संसार

प्रशासन के वेतनभोगी क्रिएटर आखिर इन प्राकृतिक नजारों को देश-दुनिया तक क्यों नहीं पहुंचाते?

चित्रकूट।
बरसात आते ही 84 कोस श्री चित्रकूट धाम का स्वरूप बदल जाता है। विंध्य की पहाड़ियों पर उतरते बादल, चारों ओर फैली हरियाली, चट्टानों से उतरती जलधाराएं और झरनों की कल-कल—मानो प्रकृति स्वयं श्री चित्रकूट महात्म्य का नया अध्याय लिख रही हो।


गर्मियों में शांत दिखाई देने वाली पहाड़ियां बारिश में जीवंत हो उठती हैं। जंगलों के बीच से निकलती छोटी-बड़ी जलधाराएं झरनों का रूप ले लेती हैं और पूरा 84 कोस क्षेत्र प्रकृति प्रेमियों के लिए किसी खुले हुए प्राकृतिक चित्रशाला जैसा दिखाई देने लगता है।



बरसात में जाग उठते हैं चित्रकूट के झरने

84 कोस श्री चित्रकूट धाम और आसपास के विंध्य अंचल में बरसात के दौरान शबरी_राघव जलप्रपात, गुप्त गोदावरी क्षेत्र की जलधाराएं, हनुमान धारा क्षेत्र, स्फटिक शिला क्षेत्र तथा आसपास की पहाड़ियों के मौसमी झरने अपना अलग रूप दिखाते हैं।

इसी प्राकृतिक पट्टी को आगे बढ़ाएं तो रीवा-पन्ना अंचल के प्रसिद्ध जलप्रपात—बहुती, चचाई, क्योटी, पूर्वा और रनेह,बृहस्पतिकुंड जैसे जलप्रपात भी मानसून में अपनी पूरी भव्यता के साथ सामने आते हैं।

इन सभी प्राकृतिक स्थलों को अलग-अलग देखने के बजाय 84 कोस श्री चित्रकूट धाम और विंध्य प्राकृतिक पर्यटन परिक्षेत्र के व्यापक संदर्भ में प्रचारित किया जाए तो बरसात पर्यटन की एक नई संभावना पैदा हो सकती है।

प्रकृति ने मुफ्त में तैयार कर दिया पर्यटन का कंटेंट

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब प्रकृति ने इतना शानदार दृश्य बिना किसी खर्च के तैयार कर दिया है, तो इसे दुनिया तक पहुंचाने में कमी क्यों?

आज प्रशासन के पास सोशल मीडिया संभालने वाली टीमें, प्रचार-प्रसार के लिए बजट और वेतनभोगी डिजिटल क्रिएटर मौजूद हैं। फिर क्यों नहीं बरसात के दिनों में 84 कोस श्री चित्रकूट धाम के झरनों, पहाड़ियों, जंगलों और जलधाराओं का नियमित वीडियो डॉक्यूमेंटेशन किया जाता?

क्यों नहीं हर बारिश में एक “Monsoon Chitrakoot” डिजिटल अभियान चलाया जाता?

कैमरा सिर्फ कार्यक्रमों पर नहीं, प्रकृति पर भी जाए

सरकारी सोशल मीडिया पर बैठकों, निरीक्षणों, उद्घाटनों और अधिकारियों के कार्यक्रमों की तस्वीरें तो आसानी से दिखाई देती हैं, लेकिन पर्यटक के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल है—

“आज चित्रकूट में देखने लायक क्या है?”

कौन सा झरना बह रहा है?
कहां तक वाहन जा सकता है?
कहां पैदल जाना होगा?
कहां सुरक्षा व्यवस्था है?
कहां पानी खतरनाक है?
कहां परिवार के साथ जाया जा सकता है?

यदि इन सवालों के जवाब छोटे-छोटे वीडियो और तस्वीरों के साथ रोजाना सोशल मीडिया पर उपलब्ध हों तो यही सामग्री पर्यटन प्रचार का सबसे प्रभावी माध्यम बन सकती है।

84 कोस की प्राकृतिक परिक्रमा का डिजिटल दस्तावेज बने

84 कोस श्री चित्रकूट धाम केवल धार्मिक आस्था का क्षेत्र नहीं, बल्कि प्राकृतिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का भी विशाल भू-दृश्य है।

बरसात इसके प्राकृतिक सौंदर्य को कुछ सप्ताह के लिए चरम पर पहुंचा देती है। यह वह समय है जब पहाड़, जंगल, झरने, जलधाराएं और मंदाकिनी का परिवेश एक साथ चित्रकूट की अलग तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।

जरूरत है कि इस पूरे क्षेत्र का डिजिटल मैपिंग, ड्रोन डॉक्यूमेंटेशन, झरना सूचीकरण और सुरक्षित मानसून पर्यटन मार्ग तैयार किया जाए।

पर्यटन प्रचार में स्थानीय लोगों की भी भूमिका

स्थानीय युवाओं, फोटोग्राफरों, पत्रकारों और कंटेंट क्रिएटरों को जोड़कर “मेरा 84 कोस—मेरा चित्रकूट” जैसा अभियान चलाया जा सकता है। इससे स्थानीय प्रतिभाओं को अवसर मिलेगा और प्रशासन को लगातार नया स्थानीय कंटेंट भी उपलब्ध होगा।

लेकिन इसके लिए सबसे पहले प्रशासन को यह स्वीकार करना होगा कि चित्रकूट का सबसे बड़ा प्रचारक स्वयं चित्रकूट की प्रकृति है।

सवाल सीधा है…

जब 84 कोस श्री चित्रकूट धाम की पहाड़ियां बारिश में हरी चादर ओढ़ रही हों, झरने कल-कल बह रहे हों, बादल घाटियों में उतर रहे हों और प्रकृति पर्यटकों को बुला रही हो—तो फिर सरकारी कैमरे इन नजारों से दूर क्यों हैं?

वेतनभोगी क्रिएटरों का कैमरा आखिर कब कार्यक्रमों से निकलकर प्रकृति की ओर जाएगा?

चित्रकूट को केवल बताया नहीं जाना चाहिए—
बरसात में उसे दिखाया जाना चाहिए।

क्योंकि इस मौसम में 84 कोस श्री चित्रकूट धाम सिर्फ देखा नहीं जाता… महसूस किया जाता है।


Saturday, August 22, 2026

याद किए गए पत्रकार वेद प्रकाश शुक्ल

पत्रकार-शिक्षक स्वर्गीय वेद प्रकाश शुक्ल की 29वीं पुण्यतिथि मनाई गई*


चित्रकूट। स्व. पं.वेद प्रकाश शिव प्रताप स्मृति सेवा न्यास के तत्वावधान में पत्रकार एवं शिक्षक स्वर्गीय वेद प्रकाश शुक्ल की 29वीं पुण्यतिथि के अवसर पर आज हाईब्रिड मोड में पुण्यतिथि मनाई गई।
 कार्यक्रम में उपस्थित एवं ऑनलाइन जुड़े लोगों ने स्वर्गीय श्री शुक्ल के व्यक्तित्व, कृतित्व और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान को स्मरण करते हुए भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की।
कार्यक्रम का संयोजन उनके सुपुत्र डॉ. जय प्रकाश शुक्ल एवं विजय प्रकाश शुक्ल ने संयुक्त रूप से किया। 
इस अवसर पर डॉ. जय प्रकाश शुक्ल  ने बताया कि स्वर्गीय श्री वेद प्रकाश शुक्ल का निधन 22 अगस्त 1997 को हुआ था। निधन के समय वे प्राथमिक विद्यालय, नई बाजार, कर्वी में पदस्थ थे। उन्होंने कहा कि स्वर्गीय श्री शुक्ल नवाचारों और वैकल्पिक शिक्षा के प्रबल पक्षधर थे। शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय योगदान देने के साथ उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा दैनिक भारत और दैनिक जागरण जैसे समाचार पत्रों के स्थानीय संवाददाता के रूप में अपनी सेवाएं दीं।
विजय प्रकाश शुक्ल  ने कहा कि स्वर्गीय श्री शुक्ल बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। उन्होंने कृषि, पत्रकारिता, व्यवसाय, उद्यमिता और समाजसेवा सहित विभिन्न क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई तथा सामाजिक सरोकारों के प्रति सदैव सजग रहे।
श्रद्धांजलि कार्यक्रम में शुक्ल परिवार के डॉ. अजय प्रकाश, वेदांत, अभिनव सहित अन्य परिजनों ने स्वर्गीय श्री वेद प्रकाश शुक्ल के चित्र पर श्रद्धासुमन अर्पित कर उन्हें नमन किया। उपस्थित लोगों ने उनके आदर्शों एवं सामाजिक सरोकारों को स्मरण करते हुए उनके व्यक्तित्व और कृतित्व से प्रेरणा लेने का संकल्प व्यक्त किया।

Friday, July 31, 2026

🌅🌺 चित्रकूट धाम से श्री कामतानाथ जी की दिव्य प्रातःकालीन मंगला आरती 🌺🌅


🎶 रिमिक्स और शोरगुल वाले भक्ति गीतों को छोड़िए...

🙏 सुनिए श्री कामतानाथ जी की नित्य आरती के साथ गाई जाने वाली प्राचीन एवं दिव्य स्तुति और कीजिए प्रभु की मंगलमयी प्रातःकालीन आरती के पावन दर्शन।

📿 यह केवल एक वीडियो नहीं, बल्कि चित्रकूट की सनातन परंपरा, श्रद्धा और भक्ति का सजीव अनुभव है।

🎥 वीडियो देखें और अधिक से अधिक सनातन प्रेमियों तक पहुँचाएँ।

🔗 "https://youtu.be/h_G-dpWRG6M?si=zYq7WU0-LCJJ4r7H" (https://youtu.be/h_G-dpWRG6M?si=zYq7WU0-LCJJ4r7H)

🚩 जय श्री कामतानाथ जी महाराज
🚩 जय श्री सीताराम
🌿 श्री चित्रकूटं शरणं प्रपद्ये

#चित्रकूट #श्रीकामतानाथ #मंगलाआरती #सनातनसंस्कृति #जयश्रीराम #भक्ति #Chitrakoot #Kamtanath #MangalaAarti

Wednesday, May 27, 2026

🕉️🚩 गंगा दशहरा पर सेवा का अमृत : रामघाट पर त्रिवेणी शरबत महोत्सव बना जनसेवा का उत्सव 🚩🕉️




चित्रकूट धाम के पावन रामघाट में आयोजित त्रिवेणी शरबत महोत्सव 2026 श्रद्धा, सेवा और सनातन संस्कृति का अनुपम संगम बनकर सामने आया। भीषण ग्रीष्म ऋतु में श्रद्धालुओं, साधु-संतों, तीर्थयात्रियों और स्थानीय नागरिकों को शीतलता प्रदान करने के उद्देश्य से आयोजित इस सेवा महोत्सव में बड़ी संख्या में लोगों ने सहभागिता की।

शाम 5 बजे से रात्रि 10 बजे तक श्रद्धालुओं ने गुलाब, पना, पुदीना, संतरा, नींबू, जीरा जल एवं विशेष त्रिवेणी शरबत सहित अनेक प्रकार के शीतल पेयों का आनंद लिया। शरबत पीकर लोग प्रसन्नचित्त और आनंदित दिखाई दिए। बाहर से आए सैकड़ों पर्यटकों एवं तीर्थयात्रियों ने भी इस अनूठी सेवा की मुक्त कंठ से प्रशंसा की।

इस अवसर पर पूर्व विधायक आदरणीय श्री दिनेश मिश्र जी ने कहा कि ऐसे आयोजन समाज में प्रेम, सद्भाव, सहयोग और मानवीय मूल्यों को बढ़ावा देते हैं तथा भारतीय संस्कृति के सेवा भाव को सुदृढ़ करते हैं।

सनातन शोध संस्थान के महासचिव श्री संदीप रिछारिया ने आयोजन के संयोजक एवं संस्थान के मंत्री श्री दयाशंकर गंगेले की सराहना करते हुए कहा कि यह सेवा आयोजन पिछले 15 वर्षों से निरंतर आयोजित किया जा रहा है, जो समाज के लिए प्रेरणास्रोत है।

इस दौरान श्री दयाशंकर गंगेले ने बताया कि बुधवार को एकादशी के पावन अवसर पर सायंकाल शरबत वितरण के साथ-साथ सनातन शोध संस्थान के अध्यक्ष प्रो. गोविंद त्रिपाठी जी की ओर से श्रद्धालुओं को फल वितरण भी किया जाएगा।



महोत्सव की संपूर्ण व्यवस्थाओं का संचालन गंगेले विश्राम गृह के संचालक श्री अंशू गंगेले ने अत्यंत सुव्यवस्थित एवं सराहनीय ढंग से किया। उनकी देखरेख में सेवा कार्य सुचारु रूप से संपन्न हुआ, जिसकी उपस्थित जनों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की।




कार्यक्रम में दादा पांडे जी (गंगा मंदिर पुजारी), छिवलहा महाराज, बिनोद तिवारी, मनोज तिवारी, अश्वनी यादव, राकेश शर्मा, गणेश केशरवानी, पुरुषोत्तम केशरवानी, गंगाराम गुप्ता, अशोक मिश्रा, राम बहोरी अतरौलिया, किशन लाल गुप्ता सहित अनेक गणमान्य नागरिक एवं धर्मप्रेमी उपस्थित रहे।

🙏 सेवा, सद्भाव और समर्पण का यह महोत्सव एक बार फिर सिद्ध कर गया कि मानव सेवा ही सनातन संस्कृति का सबसे बड़ा संस्कार है।

Saturday, March 21, 2026

चित्रकूट में दर्शन का महासंगम, विश्व शांति की दिशा में उभरा नया चिंतन




चित्रकूट: जब मंदाकिनी के तट पर विचारों की धारा बहती है, तब चित्रकूट केवल एक तीर्थ नहीं रहता—वह विश्व के बौद्धिक मंथन का केंद्र बन जाता है। तीन दिनों तक चली इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में परंपरा और आधुनिकता का ऐसा संगम देखने को मिला, जहाँ शास्त्रों की गूंज के साथ वैश्विक समस्याओं के समाधान भी खोजे गए।
भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद (ICPR) के प्रायोजन में तथा अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान, लखनऊ के तत्वावधान में आयोजित दर्शन परिषद का 40वाँ राष्ट्रीय अधिवेशन एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी तीन दिवसीय सफल आयोजन के साथ संपन्न हो गई। 19 से 21 मार्च तक चले इस आयोजन में देश-विदेश के लगभग 130 विद्वानों ने भाग लेकर अपने विचार प्रस्तुत किए।
अधिवेशन के अंतिम दिन आयोजित तकनीकी सत्र की अध्यक्षता लखनऊ विश्वविद्यालय के डॉ. प्रशांत शुक्ल ने की, जिसमें कुल 9 शोध पत्रों का वाचन हुआ। इसके पश्चात आयोजित समापन सत्र में मुख्य अतिथि भारतीय विश्वविद्यालय संघ के संयुक्त सचिव डॉ. आलोक कुमार मिश्र तथा विशिष्ट अतिथि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रो. बृजभूषण ओझा उपस्थित रहे।
विश्व शांति के लिए चित्रकूट मॉडल का प्रस्ताव
मुख्य अतिथि डॉ. आलोक कुमार मिश्र ने अपने संबोधन में कहा कि चित्रकूट में हुए दार्शनिक चिंतन के आधार पर विश्व शांति के समाधान का एक ठोस प्रस्ताव तैयार कर भारत सरकार के माध्यम से संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) को भेजा जाना चाहिए। उन्होंने ICPR के सहयोग से चित्रकूट में एक स्थायी दार्शनिक केंद्र स्थापित करने की भी वकालत की, जहाँ प्राकृतिक वातावरण में वैश्विक स्तर पर चिंतन-मंथन हो सके।
विशिष्ट अतिथि प्रो. बृजभूषण ओझा ने भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा की व्याख्या करते हुए वर्तमान समय में इसकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया।
समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. शिशिर कुमार पांडेय ने कहा कि गंगा की भांति विभिन्न विचारधाराएँ दर्शन को समृद्ध करती हैं और शास्त्र परंपरा निरंतर नवीनता लाती है।
72 शोध पत्र, 8 तकनीकी सत्र
डॉ. प्रशांत शुक्ल ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि अधिवेशन में कुल 6 ऑफलाइन और 2 ऑनलाइन तकनीकी सत्र आयोजित किए गए, जिनमें 72 शोध पत्रों का वाचन एवं विमर्श हुआ। प्रथम दिवस पर 5 स्मृति व्याख्यान मालाएँ भी आयोजित की गईं।
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दर्शन परिषद के अध्यक्ष प्रो. एच.एस. उपाध्याय ने आयोजन की सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त की। महासचिव प्रो. नीतिश दुबे ने सभी प्रतिभागियों एवं सहयोगियों का आभार व्यक्त करते हुए इसे ऐतिहासिक आयोजन बताया। उन्होंने बताया कि डॉ. हरिकांत मिश्र के संयोजन और अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान के सहयोग से यह कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
संस्थान के निदेशक डॉ. राकेश सिंह की विशेष उपस्थिति एवं मार्गदर्शन ने आयोजन को और गरिमा प्रदान की। कार्यक्रम के दौरान 19 एवं 20 मार्च को उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग द्वारा राष्ट्रीय स्तर के कलाकारों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ भी दीं।
कार्यक्रम में प्रो. स्नेहलता पाठक, प्रो. स्वाती सक्सेना, प्रो. रमेश चंद्रा, डॉ. महीप, प्रो. राकेश कुमार तिवारी, डॉ. अंबरीष राय सहित अनेक गणमान्य विद्वान एवं विश्वविद्यालय परिवार के सदस्य उपस्थित रहे। कार्यक्रम का कुशल संचालन अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के संयोजक डॉ. हरिकांत मिश्र ने किया।

हनुमान चालीसा के स्वरों से गूंजा कमल पब्लिक स्कूल, भक्ति के साथ तर्क और विवेक का पाठ

मरियम को कंठस्थ है संपूर्ण हनुमान चालीसा, बोलीं—हर व्यक्ति को नित्य करना चाहिए पाठ रामानन्द मिशन के 11 करोड़ श्रीहनुमान चालीसा पाठानुष्ठान...