Tuesday, February 18, 2020

आश्चर्यों की पहाड़ी का दर्शन कर आश्चर्य में डाल सकते हैं मोदी

 श्रीराम की आश्रय स्थली पर मोदी कर सकते हैं मंदाकिनी की सैर

संदीप रिछारिया

 भले ही अभी प्रधानमंत्री मोदी केम छो ट्रम्प के बाद अब नमस्ते ट्रम्प के जरिए विश्व के सबसे ताकतवर राजनेता की अगवानी करने की मंशा में व्यस्त हों। लेकिन उन्होंने हाउडी मोदी के जरिए दिखा दिया है कि विश्व के सबसे ताकतवर व्यक्ति को भी उनकी जरूरत है। शायद विश्व में मोदी ही इकलौते ऐसे राजनेता हैं जिन्हें जितना आधुनिकीकरण के लिए जाना जाता है उतना ही उन्हें प्रकृति से भी प्रेम है। जल, जंगल और जमीन के साथ आध्यात्म और तपस्या को लेकर संजीदा मोदी जी अपने प्रधानमंत्रित्व काल की पहली चित्रकूट यात्रा में संभव है कि कामतानाथ के दर्शन करने के साथ ही लक्ष्मण पहाड़ी पर बनाए गए रोप वे का भी आनंद उठाये। दिल्ली के विशेष सूत्रों की मानें तो वह मंदाकिनी नदी पर जाकर उनका दर्शन व आराधना भी कर सकते हैं। 

गौरतलब है कि चित्रकूट में उनके आगमन का सही प्रोट्रोकाल तो 27 फरवरी को ही आएगा। लेकिन इतना साफ है कि वह यहां पर आने के बाद केवल गोंडा ( बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे के उद्घाटन स्थल ) तक ही अपने आपको सीमित नही रखेंगे। वैसे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई की दो दिनों तक अगवानी कर अपने प्रकल्पों के दर्शन कराने वाला दीन दयाल शोध संस्थान भी इस बात को लेकर आशान्वित है कि शायद उन्हें अपने परिसर मे ंप्रधानमंत्री को लाने का कार्यक्रम मिल जाए। इस बावत संस्थान के पदाधिकारी काफी पहले से ही दिल्ली की दौड़ लगातार लगा रहे हैं। आरएसएस व संघ की नजदीकियों के कारण शायद उन्हें यह सौभाग्य प्राप्त भी हो जाए। अगर ऐसा हुआ तो मोदी जी चित्रकूट की प्राकृतिक सुषमा को शायद हेलीकाॅप्टर से ही निहार लें।


 वैसे परिक्षेत्र में निवास करने वाले जगदगुरू रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय के कर्ताधर्ता भी प्रधानमंत्री का कार्यक्रम अपने विश्वविद्यालय में लगवाने के लिए जोर लगाए हुए हैं। वैसे पूर्व में दो बार उनके कार्यक्रमों में विशेष राजनेताओं के न आने के कारण उनके कार्यक्रम उपेक्षित रह गए थे। युवराज के पट्टाभिषेक में पूर्व केंद्रीय मंत्री सुषमा स्वराज के निधन के कारण तमाम राजनेता नही आ सके थे। वह तो केवल बाबा रामदेव के आने से थोडा बहुत आकर्षण आ सका था। इसी प्रकार पिछले दिनों दीक्षांत समारोह में ठंड व कोहरे के कारण गृहमंत्री का आगमन नही हो सका, खैर मुख्यमंत्री के आगमन से कुछ साख बच गई थी। इसके अलावा सद्गुरू सेवा संघ ट्रस्ट, प्रमुख द्वार व अन्य संस्थाएं भी अपने यहां प्रधानमंत्री को लाने के लिए पैरवी कर रही हैं। 
सूत्रों की मानें तो प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में मंदाकिनी गंगा का भ्रमण जुड़ सकता है। क्योंकि प्रधानमंत्री को नदियों के किनारे जाना पसंद है। वह काशी के साथ अहमदाबाद आदि स्थानों में ऐसा करते रहे हैं। फिलहाल उनका प्रोटोकाल आने के बाद सही पता पड़ पाएगा कि उनका चित्रकूट में कार्यक्रम कहां- कहां पर जाने का है। लेकिन चित्रकूट के वासी चाहते हैं कि उनका आगमन चित्रकूट में हो और वह मंदाकिनी गंगा में आचमन करने के साथ श्री कामदगिरि की परिक्रमा करें और लक्ष्मण पहाड़ी पर रोप वे का आनंद भी उठाएं। 


चित्रकूट के सभी जल स्रोत हो पावन: साध्वी कात्यायनी गिरी

पयस्वनी उदगम ब्रह्मकुंड के शनिमंदिर में राम कथा का तीसरा दिन

चित्रकूट। पावन धाम के पावनस्थल ब्रह्मकुंड के शनि मंदिर पर चल रही श्री रामकथा के दौरान उपस्थित भक्तो को महादेव के विवाह का दर्शन कराया। उन्होंने बताया कि बाबा की बरात के बराती विचित्र वेशभूषा के साथ विचित्र वाद्ययन्त्रो पर अलौकिक नृत्य कर रहे थे।

उन्होंने कहा श्रद्धा का विश्वास से अटूट सम्बन्ध हैं ।संदेह में विश्वास नही हो सकता यह केवल श्रद्धा में ही संभव हैं । माँ पार्वती व  महादेव का विवाह हमें बतलाता है कि इनको अलग करना संभव नहीं है।ये दो दिखते हुए भी दो नहीं  है। बल्कि  श्रद्धा और विश्वास का ऐसा मिश्रण है कि ये एकाकार हो जाते है। ये तो एक दूसरे के पूरक हैंं
उन्होंने कहा कि हम नदी को बचाने में विश्वास रखते हैं तो वह विश्वास तब तक रहेगा जब  अपार श्रद्धा प्रकृति के प्रति हमारे मन में होगी ।बाबा कि बरात अलौकिक है
शिव का दरबार सबके लिए खुला है।भोले नंदी कि सवारी करते हैं अर्थात धर्मारुढ़ होकर विवाह करते हैं । व्यक्ति कोई भी कार्य करे धर्म से विमुख न हो.. रास्ते से ज़्यादा महत्त्व सवारी का है ।
दक्ष ने यज्ञ किया ,धर्म किया, रास्ता धर्म का था पर सर पर अधर्म सवार था।बाबा कहते हैं रास्ता तो निश्चित महत्त्वपूर्ण है परन्तु सवारी भी धर्म की  हो। अधर्म पर सवार होगे तो धर्म का मार्ग भी अधर्म हो जायेगा।
शैलजा का पाणिग्रहण शिव ने किया ।प्रकृति का साथ पुरुष के हाथ में है । यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि जिसका हाथ हमने थामा है उसका संरक्षण हम करे
प्रत्येक स्त्री व पुरुष के हाथ में प्रकृति का हाथ है ।उसको संभालना सजाना सवारना हम सबकी ज़िम्मेदारी हैं ।
उन्होंने कहा कि भोले बाबा स्वयं सजते नहीं ,परन्तु माता को  विवाह के बाद भी आभूषणों से सुसज्जित रखते हैं ।
खुद से ज़्यादा प्रकृति का ख्याल रखते हैं ।
आभूषण प्रतीक हैं साज सेवा के
प्रकृति को सजाना प्रत्येक मानव का धर्म है ।प्रकृति को चोट नही पहुँचाना है ।उसको बचाना है उसको सजाना है उसे सवारना है।  कथा को सुचारू रूप से चलाने की व्यवस्था अखिलेश अवस्थी, सत्यनारायण मौर्य सत्ता बाबा, धर्मदास, विधासागर महराज, शिवगोबिंद पाल सहित अन्य लोग कर रहे है।

इस तरह के विकास से चित्रकूट को बचाइये मोदी जी

इक्वाक्षु वंशियों की पुरातन शरणस्थली है चित्रकूट 

संदीप रिछारिया 


 दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार चित्रकूट आ रहे नरेंद्र दामोदर दास मोदी के पिटारे से चित्रकूट के विकास को लेकर क्या निकलेगा, यह तो अभी भविष्य के गर्त छिपा है। लेकिन रविवार को योगीजी ने दावा किया कि हम राम के आश्रय स्थल को विकास की परिधि से कैसे बाहर रख सकते हैं। इक्वाक्षु वंश के राम और उनसे पहले महराज अंबरीश की शरणस्थली पर भाजपा सरकार की कृपा करने का आशय अब छह वर्षों में समझ आया, पर वास्तविकता में विकास की कहानी कोसों दूर ही दिखाई देती है।
वन प्रस्तरों के साथ ऐतिहासिक काल की गुफाओं, हजारों वर्ष पुराने भित्ति चित्रों के साथ चौरासी कोस में फैले सतयुग, त्रेता, द्वापर के साथ कलियुग के तमाम ऐतिहासिक
पाषण दस्तावेज इस बात की गवाही देते हैं कि अगर इन सब स्थानों पर वास्तविकता में सरकार अपनी नेमत बरसाए तो चित्रकूट में सही मायने में विकास हो सकता है। यह बात दीगर है कि विकास के नाम पर सरकारों ने सीमेंट और कंक्रीट की इमारतें खड़ी कर यहां की बहुमूल्य वन संपदा को नष्ट करने का काम ज्यादा तेजी से किया। जनता के रहनुमा बनने वाले नदियों से निकलने वाली बालू, पहाड़ों के पत्थर, जंगलों से मिलने वाली लकड़ियों व औषधियों के साथ ही भूमि के गर्भ में छिपे तमाम रत्नों के दम पर धनकुबेर बन यहां पर प्रदूषण फैलाने का काम किया। धन बल, जन बल के साथ ही विचार बल का प्रदूषण यहां पर मुख्य समस्या है।
वाल्मीकि रामायण कहती है कि राम के जमाने में चित्रकूट का वैभव क्यों था। क्यों यहां पर उन्हें भारद्वाज जी ने भेजा, क्यों वे यहां पर साढे ग्यारह साल रहे। तमाम ़़ऋषि मुनियों के पास याचक बनकर जाने के पीछे अभिप्राय क्या था। इसका जवाब एक छोटी सी कथा में भले ही कथाकार दे दें पर इतना तो साफ था कि वैदिक युग में चित्रकूट ज्ञान का वह केंद्र था जिसका मुकाबला मगध, अवंतिका, पाटिलपुत्र या अन्य बड़े साम्राज्य नही कर पाए। राम को चित्रकूट में ऐसा क्या मिला तो विश्वामित्र और भारद्वाज की योजना के अनुसार उन्हें चित्रकूट में आना पड़ा। अगर हम श्रीरामचरित मानस के अंदर घुसकर कथा के वास्तविक चरित्र को समझने का प्रयास करें तो पता चलता है, त्रेता युग में चित्रकूट अग्नेयास्त्र, आयुधों के उत्पादन का एक बड़ा केंद्र था। राम को मिथिला ले जाने के दौरान महिर्षि विश्वामित्र ने ताडका खरदूषण के वध के द्वारा जांच कर ली थी कि यही राक्षसराज रावण पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने इस पुनीत कार्य के लिए माता कैेकेई को तैयार किया। माता कैकेई ने आगे की रचना कर उन्हें पत्नी समेेत वन में भेजने का निर्णय लिया। चित्रकूट आकर राम ने विभिन्न ऋषियों से मिलकर तमाम आयुध प्राप्त किए। राम को ब्रहस्पतिकुंड के पास से जो धनुष व अग्निबाण मिले, उन्हीं से रावण की मृत्यु की बात सामने आती है। साढे ग्यारह वर्ष के बाद दंडकारण्य में प्रवेश करना भी पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार था। बालीयुद्व,सुग्रीव से मिलना भी उसी कड़ी का अंश था। राम ने दिखाया कि अगर अपने शत्रु से विजय करनी है तो अपनी धरती से दूर रहकर बिना अपने घर का एक भी पैसा या व्यक्ति खर्च किये हुए कैसे लड़ाई को जीता जा सकता है। कैसे संगठन में एकता पैदा कर लड़ाई को हर एक के घर की लड़ाई में तब्दील किया जा सकता है।

 आज फिर एक नए धर्मयु़द्ध की जरूरत है। यह युद्ध विकास के आडंबर को लेकर है। जहां विकास के नाम पर लगातार विनास कर चित्रकूट को घायल किया जा रहा है। पर्यावरण का दोहन कर लगातार विकास की गाथा सुनाई जा रही है। वन प्रस्तरों को काटा जा रहा है, नदियों से बालू निकालकर उन्हें खोखला किया जा रहा है। पहाड़ों को खत्म किया जा रहा है। जमीन के अंदर से तमाम अयस्क निकालकर दोहन किया जा रहा है। इसको रोकना होगा।
 विशेष निवेदन यह है कि चित्रकूट या बुंदेलखंड का विकास केवल पर्यटन को आधार मानकर किया जा सकता है। अगर सभी इलाकों में हर एक स्थान की पहचान कर देशी व विदेशी प्रचार माध्यमों से उन्हें पूरे विश्व के सामने लाने का काम किया जाए और हर स्थान के बारे में सही जानकारी लोगों तक पहुंचाई जाए तो चित्रकूट या बुंदेलखंड देश में पर्यटन विकास को लेकर एक बड़ा स्थान साबित हो सकते हैं। और बिना बालू निकाले, बिना पत्थर तोड़े, बिना जमीन को खोखला किए राजस्व प्राप्ति का भी बड़ा साधन बन सकते हैं।

 

चित्रकूट: जहां परमात्मा बन जाते हैं याचक

चित्रकूट में विकास के मायने: (भाग एक)

क्यों श्री राम ने चित्रकूट में पूरा नही किया अपना वनवास 

संदीप रिछारिया 

चित्रकूट में आकर मुख्यमंत्री ने यहां पर विकास की गंगा बहाने का दावा किया। कहा कि जब राम की जन्मभूमि पर हमारी नेमतें बरस रही हैं तो हम उनकी आश्रय स्थली चित्रकूट को कैसे छोड़ देंगे। एक्सप्रेस वे, डिफेंस काॅरीडोर के सहारे बुंदेलखंड में विकास की गंगा बहाने का दावा करने वाले मुख्यमंत्री को शायद यह भान नहीं कि चित्रकूट का उल्लेख वैदिक धर्म के सर्वाधिक पुरातन ग्रंथ ऋग्वेद की पिप्पलादि शाखा में साफ तौर पर किया गया है। उसमें कहा गया है कि आदि काल में राजा कसु यहां के प्रतापी शासक थे। बाबरनामा में तो स्वयं बाबर ने इस बात को स्वीकार किया है कि वह आर्यावर्त के तीन शासकों से भय खाता है। जिसमें एक चित्रकूट के प्रतापी महराज रामचंद्र देव हैं। 
चित्रकूट में विकास की गंगा बहाने का दावा करने वाली सरकार के मुखिया योगी जी को शायद ज्ञात ही होगा कि यह धरती त्रिवेद ( परमपिता ब्रहमा, श्री हरि विष्णु व महादेव ) की जननी स्थली है। यहां पर त्रिदेवों को एक बार नही अनेक बार अवतरित होना पड़ा। श्री हरि विष्णु के अवतारों की तो यह लीला स्थली है। राम, परशुराम, हंस, दत्तात्रेय, सहित अन्य अवतारों को यहां पर आना पड़ा। श्रीकृष्ण अवतार के अवतरण की शुरूआत इसी भूूमि से हुई। 
विकास की बात करें तो तमाम साहित्य यह धारणा प्रस्तुत करते हैं कि आखिर त्रेतायुग में श्री राम को महिर्षि भारद्वाज ने चित्रकूट में ही क्यों भेजा। कौन से कारण थे कि राजकुमार श्रीराम यहां पर कंदराओं और वन प्रस्तरों में निवास करने वाले ऋषियों के आश्रमों में याचक की भांति गए। वे कौन से कारण थे कि उन्होंने अपने वनवास का में 11 वर्ष 6 महीने और 18 दिन बिताने के बाद दंडकारण्य में प्रवेश किया। आखिर उन्हें चित्रकूट के बाद अपनी यात्रा की आवश्यकता क्या थी। अगर वह चाहते तो वह चित्रकूट में 14 वर्ष व्यतीत कर वापस अयोध्या लौटकर अपना राजपाट संभाल सकते थे। यह कुछ सवाल हैं जो आपके चिंतन के लिए छोड़कर जा रहा हूं। आशा है कि आप इन सवालों के जवाब जरूर ढ़ंूढेंगे। नही तो कल मैं स्वयं अपने बुद्वि विवेक से इन सवालों के जवाब व आगे की कहानी बता
ने का प्रयास करूंगा।

Monday, February 17, 2020

कर्मघाट की कथा को नहीं मिलता कभी विश्रामः साध्वी कात्यायनी गिरि

 कथा बन रही है पयस्वनी नदी को जिंदा करने का आंदोलन 

चित्रकूट। अयोध्या आंदोलन के दो बड़े चेहरे महंत नृत्य गोपाल दास जी महराज व युगपुरूष संत परमानंद जी की शिष्या साध्वी कात्यायनी गिरि ने पयस्वनी नदी उद्गम स्थल ब्रहृमकुंड स्थित प्राचीन शनि मंदिर में श्रीराम कथा के दूसरे दिन राम के नाम को कर्तव्य का पूरक बताया। कहा कि गोस्वामी तुलसीदास जी महराज जी ने कलियुग में भव सागर पार करने का मंत्र राम के रूप में दिया है। वास्तव में इस मंत्र को जपने का आशय यह है कि अपनी बुद्वि को निर्मल रखकर परमात्मा की प्राप्ति करें।
किसी भी ध्येय की प्राप्ति के लिए ज्ञान, भक्ति व कर्म के साथ शरणागति होना पड़ेगा। यदि हमें नदी बचानी है, हमें पर्यावरण बचाना है, हमें अपना शहर सुंदर बनाना है, तो हमें ज्ञान के साथ कर्म की शरण लेनी पड़ेगी। कर्मघाट में कभी विश्राम नही होता।
उन्होंने कहा कि संशय भरी बुद्वि से विवेक का जन्म नही हो सकता। माता पार्वती की बुद्वि निर्मल है, जबकि मां सती की बुद्वि में संशय है। इसलिए माता पार्वती की पूजा की जाती है। नदियों को बचाने के लिए हम सबको अपने मन के साथ कर्म के लिए भी तैयार करना होगा।
उन्होंने कहा कि बुद्वि ही मनुष्य को भगवान की पहचान कराने वाली है। बुद्वि श्रद्वा युक्त हो जाए तो वह भगवान को प्राप्त करा देती है। तर्क से भगवान को नही पाया जा सकता। केवल कान से कथा नही सुन सकते। मन, बुद्वि के साथ जब कान एकाकार होते हैं तभी कथा मन के अंदर प्रवेश कर आनंद देती है। जब यह संदेह से युक्त होती हे तो यह परमात्मा से दूर कर देती है। विज्ञान के कारण प्रदूषण बढ रहा है, विज्ञान जीवनदायी व विनाशक दोनों है। हमें निर्णय करना होगा कि वास्तव में सही क्या है।
इस दौरान कथा की व्यवस्था का कार्य अखिलेश अवस्थी, सत्ता बाबा, स्वामी गंगासागर जी व संत धर्मदास देख रहे हैं। परिक्षेत्र के सैकड़ों संत व स्थानीय लोग कथा के श्रवण का कार्य करते रहे।

लुप्त पयस्वनी को जीवांत बनाने को सब जुटें- साध्वी कात्यायिनी

संदीप रिछारिया

- रामकथा मन्दाकिनी चित्रकूट चित चारु,तुलसी सुभग स्नेह वन श्री रघुवीर विहारु।

चित्रकूट। श्री

रामजन्म भूमि के लिए लंबे समय तक संघर्ष करने वाले मणिराम छावनी के महंत नृत्यगोपाल दास से सन्यास की दीक्षा व वर्तमान श्री राम जन्मभूमि मन्दिर न्यास के प्रमुख सदस्य युगपुरुष स्वामी परमानंद जी की शिष्या साध्वी कात्यासनी गिरि ने विश्व की पहली नदी पयस्वनी के पावन स्रोत ब्रह्मकुंड के ऊपर स्थापित प्राचीन शनि मंदिर प्रांगण में श्री रामकथा का शुभारंभ किया।
उन्होंने कथा की शुरुवात करते हुए रामकथा का चित्रकूट से सम्बंध परिभाषित करते हुए कहा कि चित्रकूट के कण कण में राम जी कथा विधमान है। उन्होंने ब्रह्मकुंड के बारे में बताते हुये कहा कि यह कथा अभी केवल पयस्वनी में मौजूद दिव्य आत्माओ को सुना रहे है। पयस्वनी की धारा सूख गई है,इसे जीवनदान देने के लिए हमे सबको स्वार्थ से ऊपर आना होगा, सभी को जुटना होगा। उन्होंने कहा कि स्वार्थ में  व्यक्ति अपने आपने रमने लगता है,वह किसका क्या  नुकसान कर रहा है,उसे पता नही चलता। रोज पूजा करने वाला भी मन्दाकिनी पयस्वनी का नुकसान कर रहा है।सभी लोग एक साथ आये तो पयस्वनी जीवित होगी। रामकथा ऐसा माध्यम है,जिससे सभी जुड़ेंगे और सभी जीवनदायिनी नदियों व जलस्रोतों को जीवन देने का काम करेंगे। रामकथा की शुरुवात 7 श्लोको से होने को परिभाषित किया। इस दौरान भारी मात्रा में साधू संत व स्थानीय लोग मौजूद रहे।कथा के आयोजक शनि मंदिर के सत्ता महराज व अखिलेश अवस्थी है। कथा में विशेष सहयोग स्वामी धर्मदास जी व महराज गंगासागर जी का है।

Saturday, February 15, 2020

चित्रकूट के विकास के जिम्मेदार ‘राहू-केतू‘


- परिक्रमा पथ से पुराने टीन व खंभे निकालकर नए लगाने की तैयारी
- रामघाट पर वाटर लेजर शो बन गया मजाक
- रामघाट के प्रमुख मंदिरों में करोड़ों रूपये से लगवाई गई लाइटें बेकार
- पांच साल में नही बना सकी पांच किलोमीटर सड़क पीडब्लूडी 

संदीप रिछारिया

रामलला का नाम लेकर विकास का दावा करने वाली योगी सरकार का विकास उनके अधिकारी नही होने दे रहे हैं। चित्रकूट को विश्व के मानचित्र में लाने के लिए भरपूर प्रयास करने वाली सरकार के नुमाइंदे ही विकास का काम यथार्थ रूप् में करने की जगह अपनी जेबें भरने का काम कर रहे हैं। आका के द्वारा विकास के लिए जय विजय घोषित किए गए अधिकारी वास्तव में राहू केतू का रूप धरते दिखाई दे रहे हैं।
विकास की बानगी की शुरूआत करते हैं कामदगिरि परिक्रमा पथ से, यहां पर डीएम का आदेश है कि कम से कम तीन बार सूखा पोछा लगना चाहिए। स्थानीय लोगों की मानें तो कई महीने पहले मुख्यमंत्री के आने के बाद से आज तक पोंछा नही लगा है। कहने को तो यहां पर कई गांवों के सफाईकर्मियों की बड़ी फौज लगा दी गई है, पर वे जिला पंचायत राज्य अधिकारी की कृपा से वैसे ही काम कर रहे हैं जैसे वह अधिकारियों के घरों में रोटी बनाने से लेकर झाडू, पोंछा व बर्तन इत्यादि का करते हैं। वैसे भी परिक्रमा पथ की सफाई की जिम्मेदारी उठाने वाले सफाईकर्मियों का सबेरा सुबह दस बजे के बाद होता है, एक बार हल्की झाडू मारकर उनके काम की इति श्री हो जाती है।
वर्ष 2005 में समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के बाद परिक्रमा पथ पर नए पत्थर व शेड आदि लगाने का काम प्रारंभ हुआ। अगर देखा जाए तो पिछले 15 साल बीत जाने के बाद आज तक पत्थर लगने का काम पूरा नही हो सका। अभी तक खाने कमाने की नियत के चलते चार बार पत्थर बदले जा चुके हैं। पर्यटन विभाग के अधिकारियों ने खाने कमाने के और रास्ते परिक्रमा पथ पर लगी टीन शेड से निकालने का चुना है। एक सप्ताह में बरहा के हनुमान जी के पास, साक्षी गोपाल मंदिर के पास व बिरजा कुंड के पास व लाल बाबा आश्रम के सामने शेड को पूरी तरह से निकाल दिया है। पूर्व प्रधान अशोक त्रिपाठी कहते हैं कि टीन अगर बंदरों ने तोड़ी थी तो नई टीन लगा दी जाती। पूरा स्ट्रक्चर व खंभों समेत उखाड़ना समझ में नही आ रही है। अभी तक पुराने शेंडों में बिजली न शुरू करा पाए विभाग के द्वारा यह खाने कमाने का नया तरीका है।
रामघाट में विकास की बानगी देखें तो पर्यटन विभाग द्वारा एक जनवरी से शुरू किया जाने वाला लाइट लेजर शो अभी भी टेस्टिंग के दौर में चल रहा है। कभी साउंड बजता है तो कभी केवल फौव्वारा चलता है। तूुलसीदास जी द्वारा सुनाई जाने वाली रामकथा का अता पता नही है। चरखारी मंदिर के नीचे से लेकर छवि किशोर मंदिर की तरफ बनने वाला लोहे का पुल दिसंबर में पूरा होना था, पर वह भी अभी केवल बन ही रह रहा है। जिसकी वजह से लगातार लोगों को दिक्कत हो रही है। इसी प्रकार रामधाट के विभिन्न मंदिर यज्ञवेदी, बड़ा अखाड़ा, स्वामी मत्तगयेन्दनाथ जी महराज में लगी लाइटें भी ज्यादा पावर फुल नही दिखाई देतीं। बूढ़े हनुमान जी से लकर चरखारी मंदिर तक रामघाट में लगाई गईं करोड़ों रूपयों की लाइटें बेकार पड़ी हैं। खंभों में लगाई गई एलईडी लाइटें भी महीनों से लोगों ने जलती नही देखी। भाजपा के वरिष्ठ नेता के प्रभाव के बाद प्रशासन द्वारा संतो के सहयोग से प्रारंभ की गई मंदाकिनी गंगा आरती शुरूआत से विवादित रही। कभी एमपी के संतों को ज्यादा तरहीज देने के कारण तो कभी भरत मंदिर के महंत द्वारा कोषाध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के कारण लगातार बातें सूनाई देती रहीं। पिछले दिनों वृन्दावन के संत रामदास द्वारा मंदाकिनी के घाट पर इसके विरोध स्वरूप अन्न जल का त्याग करने की बात भी खूब दिनों तक सुर्खियां बनीं। वैसे अभी भी मंदाकिनी आरती का स्वरूप् बदला नही है। आयोजक जल्द ही इसके फार्मेट में बदलाव की बात करते हैं।
 अब अगर बेडी पुलिया से लेकर रामघाट तक के मार्ग की बात करें तो पांच साल बीत जाने के बाद यह मार्ग अभी तक नही बन सका है। अबबत्ता पिछले पांच सालों में लोक निर्माण विभाग ने मार्ग को बनाने के नाम पर जहां बार-बार अपना इस्टीमेट रिवाइज कर जेबें भरने का काम किया, वहीं स्थानीय लोगों को परेशान करने का कोई भी तरीका छोड़ा नही है। हाल का मामला पर्यटक बंगले से सटे मलकाना रोड का है। दोनों तरफ से लेाकर सड़क किनारे बनने वाले नाले को अधूरा छोड़कर उसे छोटे लाने में मिलने का प्लान किया गया है। हाल यह है कि मोहल्ले के लोगों ने इसकी शिकायत जिलाधिकारी से की। जिलाधिकारी ने समस्या के समाधान का आश्वासन दिया, पर अवर अभियंता कमल किशोर लगातार स्थानीय लोगों से अपनी गुंडई कर रहे हैं।





चित्रकूट में दर्शन का महासंगम, विश्व शांति की दिशा में उभरा नया चिंतन

चित्रकूट: जब मंदाकिनी के तट पर विचारों की धारा बहती है, तब चित्रकूट केवल एक तीर्थ नहीं रहता—वह विश्व के बौद्धिक मंथन का केंद्र बन जाता है। त...