Wednesday, February 5, 2020

राम मंदिर का रास्ता साफ हुआ, ट्रस्ट बनाकर निर्माण की योजना सौंपने की तैयारी में सरकार

 शंकराचार्यों को मिली जगह, रामानंदाचार्यों से किनारा
 अखाड़ों के महंत व केंद्र व राज्य सरकार के प्रतिनिधि भी होंगे ट्रस्ट के कर्ताधर्ता  

संदीप रिछारिया 

सौगंध राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनाएंगे और अब इस नारे के पूरा होने का समय नजदीक भी आ गया है। तमाम संतों की राय सामने आने के बाद केंद्र सरकार ने भी राम मंदिर निर्माण की शुरूआत के लिए रामनवती की तिथि तय करने का मंसूबा बना लिया है।
केंद्र सरकार ने अदालत द्वारा दी गई तारीख के चार दिन पहले बुधवार को ही राम मंदिर निर्माण ट्रस्ट का गठन कर दिया। सुप्रीम को कोर्ट ने 9 नवंबर को अपने आदेश में तीन महीने में ट्रस्ट बनाने का आदेश दिया था। अब यही ट्रस्ट राम का निर्माण करेगा। ट्रस्ट का पंजीकरण दिल्ली में होगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को लोकसभा में कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ध्यान में रखते हुए कैबिनेट की बैठक में कई अहम फैसले किए गए। सरकार ने राम मंदिर निर्माण के लिए अहम फैसले के बड़ी योजना बनाई है। सरकार ने राम जन्म भूमि तीर्थ ट्रस्ट गठन का प्रस्ताव किया है। यह ट्रस्ट अयोध्या में राम जन्म भूमि पर मंदिर निर्माण के लिए उत्तरदायी होगा। कहा कि पांच एकड़ जमीन सुन्नी वक्फ बोर्ड को देने के लिए उप्र सरकार ने अनुरोध किया है, जिसे प्रदेश सरकार ने मान लिया है।
67 एकड जमीन में बनेंगा भव्य राम मंदिर 
एक्ट के तहत अधिग्रहित की गई 67 एकड भूमि पर राम मंदिर का निर्माण होगा। इसकी कार्ययोजना पूरी तरह से बना ली गई है। योगी कैबिनेट पांच एकड़ जमीन के आवंटन का पत्र भी बोर्ड को देगी। संभावना जताई जा रही हेै कि अयोध्या के पास लखनउ हाइवे पर रौनाही के धन्नीपुर में चिहिंन्त 5 एकड भूमि वक्फ बोर्ड को दी जाए।
चार शंकराचार्य ट्रस्ट में शामिल, निर्माेही अखाड़े को भी मिला सम्मान 
उच्च पदस्त सूत्रों के मुताबिक आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चारो पीठों के शंकराचार्यों को ट्रस्ट में स्थान दिया गया है। इसके साथ ही अयोध्या के महंत नृत्य गोपाल दास, दिगंबर अनी अखाड़े के महंत सुरेश दास, निर्माेही अखाड़े के महंत दीनेंद्र दास, गोरक्षपीठ गोरखपुर के प्रतिनिधि, कर्नाटक के उडूपी पेजावर पीठ के प्रतिनिधि, विहिप से ओम प्रकाश सिंहल, उपाध्यक्ष चंपक राय, विहिप के पूर्व अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष व अयोध्या आंदोलन के जनक स्व0 अशोक सिंहल के भतीजे सलिल डालमिया, दिवंगत विष्णु हरि डालमिया के परिवार से पुनीत डालमिया, एक दलित प्रतिनिधि व एक महिला प्रतिनिधि शामिल होंगी। केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी, प्रदेश सरकार के प्रतिनिधि के रूप में अयोध्या के डीएम को शामिल किया जा सकता है।


Tuesday, February 4, 2020

डिफेंस एस्पोः भविष्य का बुंदेलखंड

डिफेंस काॅरीडोर के लिए चयनित हैं झांसी व चित्रकूट 


 संदीप रिछारिया 


 बडे़ लडईया महुबे वाले इनसे हार गई तलवार। देश में जब बुंदेलखंड की बात आती है तो यहां के शौर्य की चर्चा जरूर होती है! दो नाम अपने आप जुबा पर आ जाते हैं एक महोबा व दूसरा झांसी। रानी लक्ष्मी बाई और आल्हा उदल की धरती। लेकिन एक सबसे प्रमुख बात तब छिपती दिखाई देती है कि आखिर भाजपा के थिंक टैंक ने रक्षा उपकरणों के निर्माण के लिए झांसी के साथ चित्रकूट को क्यों चुना। चित्रकूट में रक्षा उपकरणों के निर्माण के बारे में विचार करने के लिए हमें अपने टाइम स्केल को पीछे ले जाना होगा। टाइम स्केल सेट करना होगा श्री राम के जमाने में। राजकुमार राम चित्रकूट आते हैं अपनी भार्या सीता व भाई लक्ष्मण के साथ। वह यहां पर तत्कालीन ऋषियों से मिलते हैं। ज्ञान और भक्ति की बातें करते हैं, उनका आर्शीवाद लेते हैं। तभी एक घटना महिर्षि सरभंग व सुतीक्षण आश्रम के पास ऐसी घटती है। सरभंग ऋषि के आश्रम से सुतीक्षण ऋषि के आश्रम जाते समय उन्होंने एक अस्थियों का पर्वत दिखाई देता है। साथ में चलने वाले ऋषि कुमार उन्हें बताते हैं कि यह पर्वत संतों व ऋषियों की अस्थियों का है। राक्षस उन्हें मारकर खा जाते हैं और उनकी अस्थियों का ढेर लगाकर उसे पर्वत के रूप में एकत्र कर दिया है। दंडकारण्य की इस सीमा पर ऋषियों व तप करने वालों को यज्ञ आदि की अनुमति नही है। वह यह सुनते ही रघुकुल नंदन अपनी भुजा उठाकर प्रण लेते हैं कि ‘ निशिचर हीन करौं महि‘। श्री राम चरित मानस में वर्णित है कि श्री राम ने सिद्वा पहाड़ पर ऋषि व संतों की अस्थियों के ढेर देखकर प्रण किया वह धरती से राक्षसों की संतति का विनाश कर देंगे। उस समय सीता जी व लक्ष्मण जी उनके साथ थे। अब सवाल उठता है कि कि आखिर इस स्टोरी के पीछे चित्रकूट में स्थापित होने जा रहे रक्षा आयुध उपकरणों की फैक्ट्रियों से क्या संबंध है। संबंध तो है ही और पूरा है। चित्रकूट परिक्षेत्र भले ही तप और वैराग्य से भरा रहा हो। हजारों संत यहां पर आदि काल से तपस्या में रत रहे हों, लेकिन वास्तविकता यह है कि वे संत कोई मामूली नही थे। जहां उनके तप में धर्म और आध्यात्म अपनी पराकाष्ठा तक पहुंचा। वाल्मीकि जी आदि कवि थे तो सुतीक्षण, सरभंग, अगस्त, गौतम, सहित दर्जनों ऐसे ऋषि थे, जिनके पास अग्नेयास्त्र व प्रक्षेपास्त्र का भंडार था। राम को सुदर्शन चक्र व अपना धनुष भी इसी परिक्षेत्र में प्राप्त हुआ। अग्निबाण,खरबाण सहित अन्य आयुध और रक्षा करने के अन्य उपकरण यहां पर प्राप्त हुए। माता सीता को मां अनुसूइया ने अक्षय पात्र के साथ ही कभी मलीन न होने वाले वस्त्र भविष्य की योजना के अनुसार ही प्रदान किए थे। इतना ही नहीं राम जी को महिर्षि अत्रि के पुत्र आत्रेय ने आयुर्वेद का ज्ञान भी प्राप्त कराया था। उनकी चिकित्सा से बेसुध हुई सेना उठकर खडी हो जाती थी। मंगलवार से लखनउ में हो रहे डिफेंस एक्पो में विश्व भर से रक्षा उपकरण बनाने वाले कंपनियों में कितनी कंपनियां चित्रकूट में अपना कारखाना लगाने का काम करेंगी, यह तो भविष्य की बात है, पर भाजपा सरकार ने 3000 हेक्टेयर भूमि की व्यवस्था तो उनके लिए कर ही दी है। वैसे गैर सरकारी रिपोर्ट में मुताबिक पूर्व में 36 कंपनियों ने चित्रकूट में अपनी फैक्ट्री लगाने के लिए सहमति जताई थी। फ्रांस, कनाड़ा, बिट्रेन व अमेरिका, जापान जैसे देशों की कंपनियों के यहां पर आने की बात सामने आ रही थी, अब देखना यह होगा कि पांच दिनों के इस आयुध मेले का फल चित्रकूट या बुंदेलखंड को क्या मिलता है। पौराणिक आख्यान वाल्मीकि रामायण में महिर्षि अगस्त द्वारा श्री राम को शस्त्र यौंपने का वर्णन हुछ इस प्रकार मिलता है। इसमें प्रमुख रूप से भगवान विष्णु का धनुष सौंपने की बात कही जाती है। इदं दिव्यं महच्चापं हेम वजं विभूषितम।् वैष्णवं पुरूष व्याघ्र निर्मितं विश्वकर्मणा ।। अनेन धनुषा राम हत्या संख्ये महासुरान। तद्वनुस्तौ च तूर्णा च शरं खडं च मानद्।। (वारा 3ः12ः32ः35ः36) अर्थातः- पुरूष सिंह। यह विश्वकर्मा द्वारा निर्मित स्वर्णाकिंत हीरों से सुसज्जित विशालतम भगवान विष्णु का दिव्य धनुष है। इस धनुष के द्वारा संग्राम मेें भयावह असुरों का संहार कर देवताओं की लक्ष्मी लौटा लाओ। मानद! तुम इस धनुष इन दो तूणीरों को बाण व तलवार से विजय के लिए स्वीकार करो। श्री राम को महिर्षि अगस्त द्वारा शारंग धनुष सौंपने के कारण पन्ना जिले में इस गांव का नाम सारंग पड़ गया। वैसे मिथला में भी जिस स्थान पर भगवान राम ने अजगव का खंडन किया था, उस जिले का नाम ही धनुषा है। वैसे वाल्मीकि रामायण के युद्व कांड के 108 श्लोक में साफ तौर पर वर्णित है कि जब भगवान राम को रावण से युद्व करते काफी समय बीत गया तो देवराज इंद्र के सारथी मातुल ने उन्हें स्मरण कराया कि आप इस पर ब्रहृमास्त्र का प्रयोग करें। श्री राम ने उनके वाक्य पर ब्रहमास्त्र का प्रयोग किया और सर्प के समान फुफकारते हुए वाण ने रावण का संहार कर दिया। महिर्षि अगस्त द्वारा दिए गए दो बाणों में एक ब्रहमास्त्र भी था।

Monday, February 3, 2020

मंदाकिनी गंगा आरती पर विवाद

वृन्दावन से आए संत ने लगाया पारंपरिक तरीका खत्म करने का आरोप कहा कि, यह मंदाकिनी की नहीं अपितु गंगा की आरती
चित्रकूट के रामघाट पर तुलसी चबूतरे के नीचे 8 नवंबर से शुरू हुई मंदाकिनी गंगा आरती के आयोजन पर एक बार फिर विवाद खड़ा हो गया है। शनिवार को वृन्दावन से आए संत रामदास जी ने काशी की तर्ज पर वहीं से लाई गई रिकार्डिंग के आधार पर की जा रही भव्य आरती पर प्रश्नचिंह खड़े करते हुए इसे फिल्मी आरती कहा था। उन्होंने तर्क दिया था कि आरती को पारंपरिक घंटा व घडियालों के माध्यम से ही कराया जाना चाहिए। आरती गंगा की नहीं बल्कि मंदाकिनी, पनयस्वनी व सरयू की हो। बाबा भोलेनाथ की स्तुति रावणकृत न होकर संत तुलसीदास कृत रामचरित मानस वाली होनी चाहिए। रविवार की शाम भी मंदाकिनी गंगा आरती के पूर्व उन्होंने विवाद खड़ा कर आरती को प्रारंभ नहीं होने दिया। आयोजक काफी देर तक हाथ पैर मारते रहे, फिर भरत मंदिर के महंत व मंदाकिनी गंगा आयोजन समिति के कोषाध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे चुके महंत दिव्यजीवन दास नीचे आए और उन्होंने काफी देर तक महंत रामदास को समझाने का काम किया। इसी दौरान आयोजकों ने राममोहल्ला से प्रमुख द्वार के अधिकारी मदन गोपाल दास को भी बुलवा दिया। दोनों महंतों के समझाने के बाद रविवार को महंत रिकार्डिंग से आरती करवाने को राजी हुए। रविवार को आरती लगभग आधा घंटा देर से प्रारंभ हुई। आरती के बाद भी काफी देर तक विवाद की स्थिति बनी रही। आयोजकों ने रामदास जी को मनाने का बहुत प्रयास किया। अंत में रामदास जी ने घोषणा किया कि सोमवार को वह स्वयं ही पारंपरिक तरीके से आरती करवायेंगे। जिलाधिकारी शेषमणि पांडेय ने कहा कि यह आरती चित्रकूट के संतों ने प्रारंभ की है। महंत रामदास जी हमारे अतिथि हैं। सभी लोग उनका सम्मान करते हैं। उनको भी यहां के संतों का सम्मान करना चाहिए। गौरतलब है कि मंदाकिनी गंगा आरती के प्रारंभ से ही विवाद जुड़े रहे हैं। कभी स्थानीय पंडा समाज द्वारा जमीन को लेकर विवाद रहा तो कभी उत्तर प्रदेश की आरती में मध्य प्रदेश के संतों की भागीदारी को लेकर विवाद रहा। समय समय पर लोग इसका विरोध जताते भी रहे।

Thursday, January 30, 2020

श्री राम ने ही नहीं सीता ने भी की थी चित्रकूट में शक्ति की आराधना



कामदगिरि पर मौजूद  हैं माता के पीठ

संदीप रिछारिया


वेद कहते हैं कि राम के आगमन से पूर्व सतयुग के प्रारंभ से चित्रकूट एक बहुत सुंदर देवी पीठ था। श्रीराम व मां जानकी ने यहां पर देवी की आराधना की और शक्तियां अर्जित कीं। तंत्र चूडामणि, ज्ञानार्णव दाक्षायणी तंत्र, योगिनी हृदय तंत्र व शिव चरित्र सहित अनेक ग्रंथ यहां पर शक्तिपीठ होने की पूर्ण पुष्टि करते हैं। ग्रंथ इसे पीठों में सर्वोत्त्म पीठ होने की संज्ञा देते हैं। तंत्र चूडामणि रामगिरौ स्तेनान्यं च परिभाषित करता है तो देवी भागवत व मत्‍स्‍य पुराण में चित्रकूटे तथा सीता विन्‍ध्‍यै  विंध्यैवासिनी की पुष्टि‍ करता है । तांत्रिक लक्ष्मी कवच तो सीधे तौर पर सुखदा मोक्षदा देवी चित्रकूट निवासिनी। भयं हरते् सदा पायाद् भव बंधनात् विमुच्यदते।। घोषित करता है। 


 चित्रकूट का नाम सामने आते ही लोगों को याद आते हैं राम । याद आती हैं चित्रकूट की वो शिलाएं जो भाईयों के प्रेम को देखकर पिघल गईं थी। लेकिन उससे बडा एक सच यह भी है कि आखिर भारद्धाज मुनि ने श्रीराम को चित्रकूट ही क्यों भेजा। वह चाहते तो एक बार फिर श्रीराम को महर्षि विश्वामित्र के पास भेज सकते थे या फिर ऋषि वाल्मीकि के पास ही चौदह साल रहने का निर्देश दे देते । श्रीराम का चित्रकूट में साढे ग्यारह साल से ज्यादा का समय गुजारना सब कुछ देवताओं व ऋषियों की योजना के अनुसार हुआ । वास्तव में ऋषि अगस्तं अंगिरा सरभंग सुतीक्षण सहित अन्य ऋषियों से उन्हें  राक्षसराज रावण को मारने के लिए आयुध प्राप्त तो करने ही थे साथ ही यहां पर मां मोक्षदा से उन्हें शक्तियां भी अर्जित करनी थी। वेद कहते हैं कि राम के आगमन से पूर्व सतयुग के प्रारंभ से यह स्थान एक बहुत सुंदर देवी पीठ था। यहा पर मां मोक्षदा देवी का पीठ तो पहले से ही था, इसके साथ श्रीराम व मां जानकी ने यहां पर देवी की आराधना की और शक्तियां अर्जित कीं। तंत्र चूडामणि, ज्ञानार्णव दाक्षायणी तंत्र, योगिनी हृदय तंत्र व शिव चरित्र सहित अनेक ग्रंथ यहां पर शक्तिपीठ होने की पूर्ण पुष्टि करते हैं। ग्रंथ इसे पीठों में सर्वोत्तम पीठ होने की संज्ञा देते हैं। तंत्र चूडामणि रामगिरौ स्‍तन्‍यां च  परिभाषित करता है तो देवी भागवत व मत्‍स्‍य पुराण में  चित्रकूटे च सीता विन्‍ध्‍ये  विंध्यवासिनी की पुष्टि‍ करता है । 

तांत्रिक लक्ष्मी  कवच तो सीधे तौर पर ष्सुखदा मोक्षदा देवी चित्रकूट निवासिनी। भयं हरते् सदा पायाद् भव बंधनात् विमुच्यधते।।  परिभाषित करता है।
वैसे चित्रकूट में शक्तिपीठ होने की कथा भी बहुत ही पौराणिक हैा श्रीमद् भागवत में उल्लखित है कि सतयुग के प्रारंभ में प्रजापति दक्ष ने कनखल के समीप सौनिक तीर्थ में ब्रहस्प‍ति सब नामक यज्ञ किया। इस यज्ञ में भगवान भोलेनाथ को छोडकर सभी देवताओं व ऋषियों को निमंत्रण दिया गया। माता सती ने सभी देवताओं के विमान कैलास से दूसरी दिशा की ओर जाते देख महादेव से इसका कारण पूंछा भगवान ने उन्हें उनके पिता द्वारा यज्ञ के आयोजन के बारे में बताया । माता ने वहां पर जाने का अनुरोध किया तो भोलेनाथ कहा कि बेटी का घर विवाह होने के पूर्व तक पिता का होता है। विवाह के पश्चाात उसका घर पति का होता है अतएव उनका वहां पर जाना उचित नहीं होगा। माता ने पिता के घर में अपने अधिकार होने की बात कह कर भोले नाथ से जाने की अनुमति प्राप्ति कर ली। भोले नाथ ने अपने गण वीरभद्र के साथ उन्हें  जाने की आज्ञा दी। वहां पर जाकर जब माता ने अपने पति का हवि भाग व बैठने का स्थान न पाया तो वह कोधाग्नि से भडक उठीं और अपने आपको हवनकुंड में जलाकर नष्टं करने का प्रयास किया। इसी दौरान वीरभद्र और भगवान भोलेनाथ ने पहुंचकर यज्ञ को नष्ट कर डाला। राजा दक्ष का सिर काटकर यज्ञ कुंड में डाल दिया। महादेव माता का जला हुआ मृत शरीर लेकर ब्रह़मांड में करूण विलाप करते हुए विचरण करने लगेा तभी देवताओं की मंत्रणा के बाद श्रीहरि विष्णुु ने अपने सुदर्शन चक्र को आदेश दिया कि वह माता के अंगों को काट दे ताकि महादेव के अंदर से मोह का निवारण हो सके और सृष्टि का क्रम चल सके । चक्र ने जैसे ही अंग काटे वह धरती पर गिरकर पाषाण में परिवर्तित हो गए । भूतल पर उन्हें महातीर्थ मुक्तिक्षेत्र व शक्तिपीठों की संज्ञा प्राप्त हुई । जहां पर कमर के उपर के अंग गिरे उन्हें दक्षिणमार्गी शक्ति पीठ व नीचे के अंग गिरने के स्थानों को वाममार्गी शक्तिपीठ कहा जाने लगा । यहां पर शक्ति भैरव व बीज मंत्रों का प्रादुर्भाव हुआ । तंत्र चूडामणि ज्ञानार्णव दाक्षायणी तंत्र योगिनी हृदय तंत्र एवं शिव चरित्र में 51 शक्तिपीठों का वर्णन है । देवी भागवत मत्‍स्‍यपुराण में उप पीठों सहित 108 का वर्णन है। देवी गीता में 72 का और कालिका पुराण में 26 पीठों का वर्णन मिलता हैा 51 शक्तिपीठों में 9 पीठ पहले से ही पडोसी राष्ट्रों  में हैं । श्रीलंकाए पाकिस्तांनए तिब्‍बत में एक-एक नेपाल में दो व बांग्ला देश में चार शक्तिपीठ मौजूद हैं । आज के भारत में केवल 42 शक्तिपीठ की बताए जाते हैं ।   
वैसे इसके अलावा भी चित्रकूट की धरती पर और भी अलग तरह के शक्तिपीठ होने के तर्क दिए जाते हैं।
 कैवल्योनपनिषद में  सा सीता भवति मूल प्रकृति संज्ञिता। उत्पत्ति स्थिति संहार करणी सर्व देहि नाम।। शक्ति शक्तिमान श्रीसीता जी और श्रीरामजी ही जगत के स्रष्टाि नियामक एवं संहार करने में समर्थ बताए गए हैं। माता सीताजी को ही परा अपरा व चित्तं शक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है ।
चित्रकूट के प्रसिद्व संत राम सखेन्द्र  जी महराज की लिखी श्रीमन्न नृत्यराघव मिलन में इस बात का प्रमाण है कि  कामद जनक लली कर रूपा चित्रकूट रघुनाथ स्वमरूपा में पूर्ण रूप से मिलता है । प्रमोदवन के रहने वाले संत स्‍व0 श्री लखन शरण महराज ने  श्री जानकी धाम पदए बंदौं बारंबार। जाकी कृपा प्रताप तें मिल्यौ  संत दरबार।। वैसे रामाज्ञा प्रश्न में गोस्वामी तुलसीदास जी भी सीधे तौर पर चित्रकूट धाम को पीठ घोषित करते हैं।  पय पावनी वन भूमि भलि शैल सुहावन पीठ। रागिहिं सीठ विशेषि थलुए विषय विरागिहि मीठ।।
वह एक तर्क और देते है कि किसी भी रामतीर्थ में बलि का कोई प्रावधान नहीं है । लेकिन चित्रकूट में नारियल के रूप में बलि का प्रावधान किया गया है । श्रीकामदगिरि पर्वत में मौजूद कामतानाथ जी के चार द्वारों पर नारियल की बलि स्वीदकार की जाती है । बलि तो शाक्तन परंपरा के अनुसार प्रमुख प्रसाद है । यहां पीठ होने के कारण यहां पर ऐसा होता है । इसके साथ ही देवी के सामने माथा रगडने पर ही वह मनोकामनाओं को पूर्ण करती है । इसलिए यहां पर लोग अपना माथा रगड. रगड कर मनौतियां पूरी करने के लिए गुहार लगाते हैं । वैसे एक दृष्टां त और भी देखने योग्यर है । वृहद चित्रकूट महात्मन के अनुसार माता सीता ने भी यहां पर देवी की स्थापना की थी । दुर्गा भगवती माया सीताया स्था पिताेघ। तताश्रमं च तं विद्वि दुर्गा पर्वतमुत्मम् ।। इसका अर्थ है कि माता सीता ने दुर्गा पर्वत पर माता दुर्गा की स्‍थापना की थी और पूजा की थी ।
वही चित्रकूट वृहद महात्म में भी पीठानाम् परम पीठं पर्वतानां च पर्वतम्। धर्माभिलाष बुद्विनां धर्मराशिकरम्प रम् । अर्थानामार्थं दातारं परमार्थ प्रकाशकम् । कामिनां कामदातारं मुमुक्षूणां च मोक्षदम्। सवर्त्र श्रूयते तस्या महिमा द्विज सत्तमम्।।
 वैसे श्री कामदगिरि के कई नाम हैं। इसे रामगिरि व श्रीगिरि भी कहा जाता हैा अलग- अलग पुराणों में इसका उल्लेम अलग नामों से किया गया हैा वृहद चित्रकूट महात्मप में इसे रामगिरि या श्री गिरि ही उल्लखित किया गया है । श्री गिरि का तात्पर्य श्री हरि विष्णु‍ की पहली पत्नीै श्रीसीता जी से हैा उन्हें केवल श्री से भी संबोधित किया जाता है । वैसे शुक्ल यजुर्वेद में  श्रीश्चय ते लक्ष्मी पत्‍न्‍यौ  साफ तौर पर लिखा है।
ऋग्वेेद का पंचम आत्रेय मंडल के नाम से विख्यात हैा इसके मंत्रदृष्टा‍ अत्रि ऋषि हैं। जिसमे अति प्रसिद्व अत्रि सूत्रों सहित आर्चाप्राण ष् श्री सूत्र  तक समाहित हैं। यही श्रीसूत्र मां जानकी का यशोगान है । दूसरी ओर भ्रगुवंश के तपोनिष्ठ पुराण प्रवक्ता  मारकंडेय ऋषि ने तेरह अध्यायों में वॉछा कल्पैतरू दुर्गासप्तशती इन्हीं भगवती का यशोगान किया है । तीसरी ओर श्रीजी की उपासना सरभंग त्रषि ने बहुत ही मनोयोग से की थी। भुशुंडि रामायणकार कहते हैं सुतीक्षण वंदिता पूज्या  सरभंगाश्रमवासिनी । इसलिए चित्रकूट सीता शक्तिपीठ एवं श्री धाम होने के नाते सीता तीर्थ के नाम से सुविख्यात हो गया । अठारवीं शताब्दीे में रामघाट से उत्तर के इलाके को महंत चरणदास ने इसे सीतापुरष् नाम से प्रतिष्ठित किया जो आज भी लोगों द्वारा लिया जाता है । वैसे तुलसीदास जी के काल में श्रीकामदगिरि की तलहटी पर श्रीपुर नामक गांव का उल्लेख मिलता है ।
सीतोपनिषद में सीधे तौर पर चित्रकूट में दीपमालिका का पर्व मुख्य पर्व होने की मान्‍यता को पुष्ट कर देता है । अर्थवेदीय कौशिक सूत्र सहित वृहद चित्रकूट महात्म अमावस्या  व पूर्णमासी को यहां के पर्व घोषित करते हैं। 
वैसे एक अन्य प्रमाण के अनुसार श्री कामदगिरि परिक्रमा में ही साक्षी गोपाल मंदिर पर स्थापित नौ देवी की प्रतिमाओं को भी मां जानकी के द्वारा स्थापित बताया जाता है । वैसे दक्षिणमुखी यह प्रतिमा भी बहुत ही ज्यादा प्राचीन व पवित्र मानी जाती हैए इसी मंदिर के उत्तर मुख पर गोपाल जी मौजूद हैं । मान्यता के अनुसार गोपाल जी श्री कामदगिरि परिक्रमा करने वाले प्रत्येक व्यक्ति जो मंदिर के खंभों पर साक्ष्यर के रूप में उंगली से सीताराम लिखते हैं तो वह साक्ष्य‍ के रूप में दर्ज हो जाता हैा
इसके अलावा भी चित्रकूट परिक्षेत्र में शक्ति की उपासना के तमाम केंद्र हैं। हनुमान धारा रोड पर स्थित वन देवी के मंदिर के बारे में मान्यता है कि यह अयोध्या  राजवंश की कुलदेवी हैं। जबकि कुछ मत इन्हें  भी शक्तिपीठ मानते हैं वैसे यहां पर माता सीता के स्पष्ट रूप से चरण चिंह मौजूद हैं। इसी प्रकार अनुसुइया आश्रम व गुप्त गोदावरी भी देवी अर्चना के स्थान हैं। अनुसुइया आश्रम में चौसठ योगिनी की शिला अपने आपमें अतभुद है ।
वैसे जहां एक ओर भगवान राम पर आरोप लगाते हैं कि उन्होंने माता सीता की अग्नि परीक्षा ली और एक धोवी के कहने पर उन्हें वन में भेज दिया वहीं दूसरी ओर चित्रकूट ऐसा स्था न है जहां पर श्री राम ने माता सीता का पूजन भी किया है। इस बात का प्रमाण स्वयं संत तुलसीदासजी श्रीरामचरित मानस में देते हैं।  एक बार चुनि कुसुम सुहाएए मधुकर भूषण राम बनाए ।  सीतहिं पहिराए प्रभु सादर बैठे फटकि शिला पर सुंदर। यहां पर संत ने श्रीराम के द्वारा माता को आभूषण पहनाने का जिक्र सादर के रूप में किया है । सादर शब्दर का अतभुद प्रयोग अपने आपमें अनुपम है। व्य क्ति जब किसी की पूजा करता है तो उसे सादर रूप में ही कुछ वस्तु‍ अर्पित करता है। इसलिए उन्होंने जगतजननी मां सीता श्रंगार बहुत ही प्रेम पूर्वक श्रद्वा के साथ किया है । इसलिए चित्रकूट को काम की नहीं अपितु राम की भूमि कहते हैं । जिस स्था्न पर पत्नी को पति सादर रूप में आभूषण अर्पित करे तो वह पूज्यनीय है। 
वैसे अन्य  प्रमाणों के अनुसार यह भी सिद्व होता है कि वास्तव में कामदा नाम माता सीता का ही है।  दुर्गा संकट नाशन स्त्रोहत में कामाख्यां कामदा श्या्मां काम रूपां मनोरमाम का उल्लेख आया है । इसी तरह के अर्थ मुंडमाला तंत्र पदमपुराण के संकटा स्त्रोत्र देवी भागवत लक्ष्मी सहत्रनाम ब्रह़मपुराण के ललितोपाख्या न में  बगला सहत्रनाम सहित अन्य् ग्रंथों में मिलते हैं। अतएव हम यह भी मान सकते हैं कि कामदनाथ ही मां सीता का स्वरूप हैं ।
..................
पर्णकूुटी में भी स्‍थापित है मां दुर्गा की मूर्ति
द़ष्‍टांत है कि पर्णकुटी पर ही कोल भीलों द्वारा भगवान राम ने आकर पहली बार विश्राम किया थाा यहा पर भगवान राम व भरत की का मंदिर है, तथा दुसरा मंदिर केवल लक्ष्‍मण जी का हैा मंदिर के पुजारी का दावा है कि राम और भरत के साथ लक्ष्‍मण जी का मंदिर पूरे विश्‍व में केवल चित्रकूट में ही हैा यहां पर भी एक दुर्गा देवी की प्रतिमा स्‍थापित हैा

       

पाक साफ संतों की ‘नापाक‘ हरकत

श्री कामदगिरि की परिक्रमा का अतिक्रमण साफ करने का दावा करने वाले प्रशासन की बिरजाकुंड के पास प्राचीन बीहर पर कब्जा करने वाले को क्लीन चिट 

संदीप रिछारिया

सीएम योगीजी के आदेश व श्रद्वालुओं की बढ़ती संख्या को लेकर प्रशासन ने अब श्रीकामदगिरि परिक्रमा पथ पर बसी खोही बस्ती की जमीन को खाली कराकर चौड़ीकरण कराने के लिए पूरी तरह से कमर कस ली है। राजस्व व वन विभाग ने लगभग एक सैकड़ा लोगों को नोटिस देकर दस दिनों में जमीन खाली करने के आदेश दिए हैं। जिलाधिकारी की बैठक के बाद जहां एक
ओर जमीनों पर रह रहे लोग परेशान हैं, वहीं तमाम अतिक्रमण किए हुए स्थानों पर संत समाज द्वारा अतिक्रमण किए जाने को लेकर स्थानीय लोगों में तीखी नाराजगी भी है। वैसे पर्वत की तरफ अस्थायी व स्थायी निर्माण कर रहने वाले लोगों के भी दो मत हैं। पट्टों की जमीन पर भूमिधरी होने के बाद तमाम लोग अदालतों के आदेश लेकर मुआवजा की मांग कर रहे हैं तो बहुत से लोग इस कार्यवाही को गलत बता रहे हैं।
परिक्रमा मार्ग पर दुकान लगाकर गुजर बसर करने वाली अंशु, दादू, पप्पू जैसे तमाम दुकानदार कहते हैं कि हमारा अतिक्रमण तो सामने प्रशासन को दिखाई दे रहा है, पर संत समाज का अतिक्रमण नहीं दिखाई दे रहा है। बिरजा कुंड के पास निर्मोही अखाड़ा ने कब्जा कर पहले छोटी कुटिया बनाई और धीरे धीरे रामधुन बैठाकर मंहिदर का निर्माण किया। चाहद्दी बनाकर पर्यटन विभाग के दो शेडों को अपने सीमा के अंदर कर पूरी तरह से कब्जा कर लिया और राजाओं की बनाई पुरानी बेशकीमती चार मंजिला बीहर को पूरी तरह से गायब करने के लिए बाहर कमरे इत्यादि बना दिए। पट्टे की जमीन को भूमिधरी और फिर उस जमीन पर प्राचीन बनी बीहर का कब्जा प्रशासन को केवल इसलिए नहीं दिखाई दे रहा है क्योंकि वहां से जुड़े एक महंत प्रशासन के बहुत नजदीकी हैं। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि यह प्रशासन की दोगली नीति नही चल पाएगी। इसको लेकर आंदोलन किया जाएगा व कोर्ट की शरण ली जाएगी। जब प्रशासन कहता है कि हजार साल पुराना पट्टा भी अवैध है तो फिर इस पट्टे को क्यों नही खारिज किया जा रहा है। क्यों प्राचीन बीहर व पर्यटन विभाग द्वारा बनवाए गए शेडों को यात्रियों की सुविधा के लिए खोला जा रहा है।
 उप जिलाधिकारी कर्वी ने बताया कि प्राचीन बीहर होने जानकारी मिली है। इसकी पूरी जांच कराकर विधिक कार्यवाही की जाएगी। 

Tuesday, January 28, 2020

ब्रह्मपुरी,,,,,मानव जन्म का पहला स्थल चित्रकूट,,,,,भाग दो

पुराणों में स्वर्ग से भी ज्यादा सुंदर स्थान बताया गया है
संदीप रिछारिया
चित्रकूट के स्थानों में ब्रह्मपुरी का प्रधान स्थान है । सैकड़ों चित्रकूट वासी श्रद्धालु ब्रह्मपुरी की प्रतिदिन प्रदक्षिणा करते है । वृहद् रामायण तो यहाँ तक कहती है -
नार्यावर्त समादेशो न बह्म सदृशी पुरी ।
न राघव समोदेवः क्वापि ब्रह्माण्डगोलके ।।
अर्थात- इस ब्रह्माण्ड में न तो आर्यावर्त जैसा देश है, न ब्रह्मपुरी जैसी पुरी है, न श्री राम जैसा देवता ही है ।
स्वर्गलोकादधिकं रम्यं नास्ति ब्रह्माण्ड गोलोके
स्वर्गलोक से रम्य कोई भी स्थान नहीं होता पर यह ब्रह्मपुरी स्वर्ग से भी अधिक रम्य है । वर्णन है -
स्वर्गलोकाद्रमणीय च पुरी ब्रह्म प्रतिष्ठिता
अधिक क्या  जब प्रभु श्री राम ने पर्णशाला का निर्माण
इसी पुरी के मध्य किया तब उससे रमणीय होगा ही क्या...... 
निर्वाणी अखाड़े के महंत स्वामी सत्यप्रकाश दास जी स्पस्ट रूप से इस तथ्य को कहते है कि चित्रकूट में यज्ञ वेदी मन्दिर में स्थित ब्रह्मा जी द्वारा बनाया गया हवनकुंड सतयुग से लेकर आज भी जाग्रत अवस्था में है। यहाँ पर आकर दर्शन करने वालो के पापो का नाश होता है व सभी मनोकामनाएं पूरी होती है।

Monday, January 27, 2020

चित्रकूट में मौजूद है सृष्टि के आरंभ का स्‍थान ब्रह़मपुरी -- भाग एक

आइये हम आपको परिचित कराते हैं आपके डीएनए से 

- चित्रकूट में बना था मानव का पहला डीएनए
- सप्तऋषियों के साथ वेद, पुराण, निगम, आगम व देवी सरस्वती को उत्पन्न किया था प्रजापति ब्रहमा जी ने

- मनु व सतरूपा थे पहले पुरूष व स्त्री 

संदीप रिछारिया 
डीएनए यानि डी-आक्सीराइबोन्यूक्लिक अम्ल, यह अब ऐसा शब्द है जिससे लगभग सभी लोग परिचित हो चुके हैं। वास्तव में यह हमारे उन गुणसूत्रों का पता देता है कि हमारी जड़े कहां से जुड़ी हैं और हमारी मूल आदतें क्या हैं। आधुनिक विज्ञान की यह खोज 1953 में अंग्रेजी वैज्ञानिक जेम्स वाॅटसन और फ्रान्सिस क्रिक ने की। लेकिन हम आपको यह बताते हैं कि आपकी जड़े मूलरूप कैसे और कहां से जुड़ी हैं। कहां है आपकी पितृधरती और कौन है आपके गुणसूत्रों के प्रथम संवाहक। अगर आप हिंदू धर्म को मानने वाले हैं तो आपको थोड़ा सजगता के साथ याद करना होगा। किसी भी पूजा या अनुष्ठान में संकल्प करते समय जब पुरोहित आपसे आपका नाम लेने के लिए बोलते हैं तो साथ में गोत्र का उच्चारण करने के लिए भी आदेश देते हैं। वास्तव में यह गोत्र रूपी शब्द ही आपके डीएनए का पहला श्रोत है। गोत्र का मतलब आप सप्त में से किसी एक उस ऋषि के वंशज हैं, जिन्हें प्रजापिता ने धरती पर अवतरित किया था।
अब सवाल उठता है कि परमपिता ने उन्हें कहां और किसी प्रकार उत्पन्न किया था। इसका जवाब यह है कि त्रिदेवों (ब्रहमा, विष्णु व महेश ) द्वारा पूजित यह धरती सृष्टि आरंभ के पूर्व से ही अपने आपमें अनोखी रही है। त्रिदेवों ने मंत्रणा कर जब सृष्टि के आरंभ के लिए योजना बनाई तो निर्णय लिया गया कि इसकी शुरूआत चित्रकूट की पावन धरती से ही होगी। क्योंकि आने वाले समय में यही एक मात्र ऐसी धरती होगी, जहां पर स्वयं महादेव के राज में ब्रहमा व विष्णु की पूजा होगी। ब्रहमाजी ने योेजना के अनुसार श्री हरि विष्णु के चरण कमलों से विश्व की पहली नदी पयस्वनी ( दूध के समान ) को प्रकट किया और स्वयं रामार्चा रूपी यज्ञ में लग गए। समयानांतर के बाद मन से मारीच, नेत्रों से अत्रि, मुख से अंगिरा, कान से पुलस्त, नाभि से तुलह, हाथ से कृतु, त्वचा से भ्रगु, प्राण से वशिष्ठ, अंगूठे से दक्ष तथा गोद से नारद उत्पन्न हुए। इसी प्रकार दाएं स्तन से धर्म, पीठ से अधर्म, हृदय से काम, दोनों भौहों के बीच से क्रोध, मुख से सरस्वती, नीचे के होठ से लोभ, लिंग से समुद्र, छाया से कर्दम ऋषि, प्रकट हुए। उनके पूर्व मुख से ऋग्वेद, दक्षिण से यजुर्वेद, पश्चिम से सामवेद और उत्तर मुख से अथर्ववेद की ऋचाएं निकलीं। इसके बाद उन्होंने आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद तथा स्थापत्व आदि उप वेदों की रचना की। उन्होंने अपने मुख से इतिहास पुराण उत्पन्न किया और फिर योग विद्या, दान, तप, सत्य, धर्म की रचना की। उनके हृदय से ओंकार,अन्य अंगों से वर्ण,स्वर, छंद आदि क्रीडा के सात स्वर निकले। इसके बाद ब्रहमा जी को लगा कि सृष्टि में वृद्वि नहीं हो रही है तो उन्होंने अपने शरीर को दो भागों में विभक्त कर दिया। जिसका नाम का औैर या हुए। का से पुरूष व या से स्त्री की उत्पत्ति हुई। पुरूष का नाम मनु व स्त्री का नाम सतरूपा रखा गया। 
आज के परिवेश में चित्रकूट में ब्रहमा जी का वह मंदिर यज्ञवेदी के रूप् में रामघाट के उपर विद्यमान है। यहां पर उनका बनाया हवन कुंड भी है। चित्रकूट के अलावा ब्रहमा जी की पूजा पुष्कर में होती है। इसके पीछे भी तमाम अंर्तकथाएं हैं। कोई अंर्तकथा शिव जी के श्राप को बताती है तो कोई अंर्तकथा विष्णु के श्राप को। लेकिन सार्वभौमिक सत्य यह है कि हर एक व्यक्ति का पहला डीएनए चित्रकूट की धरती पर आज भी विद्यमान है।
कैसे खोजें अपना डीएनए 
डीएनए को पता लगाने के संदर्भ में आचार्य नवलेश दीक्षित जी आसान सा जवाब देते हैं। लगभग हर हिंदू जब पूजा पाठ में बैठता है तो उससे पुरोहित नाम व गोत्र का उच्चारण करने को बोलते हैं। गोत्र ही उनके डीएनए का मुख्य बिंदु है। आपको अपने डीएनए की सत्यता पता लगानी है तो अपने गोत्र के ऋषि व उनके वंशजों के बारे में अधिक से अधिक जानकारी करें, उनके आदतों व लक्षणों को देखकर आप अपने आप ही सत्य से भिज्ञ हो जाएंगे। 

चित्रकूट में दर्शन का महासंगम, विश्व शांति की दिशा में उभरा नया चिंतन

चित्रकूट: जब मंदाकिनी के तट पर विचारों की धारा बहती है, तब चित्रकूट केवल एक तीर्थ नहीं रहता—वह विश्व के बौद्धिक मंथन का केंद्र बन जाता है। त...