समुद्र मंथन के विशेष चरण में जब देवी महालक्ष्मी का प्राकट्य हुआ तो वह दीपावली की रात्रि थी। माता ने जैसे ही श्री हरि विष्णु को चुना, अंधकार में डूबी सारी सृष्टि दीपों के उजाले से भर उठी। उसी पवित्र क्षण में जब लक्ष्मी-नारायण की नजर ब्रह्मा जी की प्रथम तपस्थली चित्रकूट गिरि पर पड़ी, तो उन्होंने इसे ही अपना परम ठिकाना बना लिया। इसके बाद श्री हरि ने धरा पर जो भी अवतार लिए, चित्रकूट की यह पावन धरा उन सभी से सदैव जुड़ी रही। त्रेतायुग में जब भगवान श्री राम ने लंका पर विजय प्राप्त की, तो अयोध्या लौटने से पहले वे ऋषियों का आशीर्वाद लेने और उनका आभार जताने अपनी इसी 11 वर्ष 6 महीने 18 दिन की वनवास स्थली पर आए थे। तब चित्रकूट के संतों, कोल-भीलों और स्थानीय निवासियों ने कार्तिक अमावस्या के दिन मंदाकिनी नदी के तट पर प्रभु के स्वागत में इतिहास का सबसे पहला महा-दीपदान किया था। त्रेतायुग की वही ऐतिहासिक परंपरा आगामी 8 नवंबर 2026 को कलयुग में एक बार फिर जीवंत होने जा रही है, जिसके लिए मध्य भारत के इस सबसे विशाल मेले में 50 लाख से अधिक श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटने का अनुमान है।
भक्ति और आमोद-प्रमोद का अनूठा संगम बनेगा मेला
चित्रकूट का यह पांच दिवसीय मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि अटूट जन-आस्था, लोक-परंपरा और आमोद-प्रमोद का एक ऐसा अनूठा संगम बनने जा रहा है जहां बिना किसी सरकारी आमंत्रण के देश के कोने-कोने (विशेषकर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान) से लाखों ग्रामीण खिंचे चले आएंगे। मेले में जहां एक तरफ भक्ति का सात्विक रंग बिखरेगा, वहीं दूसरी तरफ लोक संस्कृति का उल्लास भी चरम पर होगा। मंदाकिनी नदी के रामघाट और राघव प्रयाग घाट पर जब लाखों श्रद्धालु एक साथ दीपदान करेंगे, तो मीलों दूर तक नदी का पानी जलते हुए दीयों की रोशनी से स्वर्णमयी आभा में तब्दील हो जाएगा। इसके साथ ही, ५ किलोमीटर लंबे कामदगिरि पर्वत की परिक्रमा लगाने के लिए श्रद्धालुओं की एक ऐसी अटूट मानव-श्रृंखला बनेगी, जो चौबीसों घंटे बिना रुके 'जय श्री राम' के उद्घोष के साथ चलती रहेगी। मनोरंजन और व्यापार के रंग को गाढ़ा करने के लिए यहां मुगलकाल (औरंगजेब के समय) से चला आ रहा ऐतिहासिक 'गधा मेला' भी आयोजित होगा, जहां देश भर के व्यापारी पशुओं की खरीद-बिक्री के लिए जुटेंगे, जो मेले के आमोद-प्रमोद वाले पहलू को जीवंत करेगा।
रहस्यमय अनुष्ठान: सपेरों की साधनाएं और तंत्र क्रियाएं होंगी सक्रिय
इस मेले की एक अंतर्धारा भारत की प्राचीन तांत्रिक और कबीलाई संस्कृतियों से भी जुड़ी है। कार्तिक अमावस्या की काली रात (महानिशा) को तंत्र शास्त्र में बेहद शक्तिशाली माना गया है, जिसके कारण चित्रकूट के निर्जन जंगलों और घाटों पर कई रहस्यमयी अनुष्ठान संपन्न होंगे। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान से आने वाले सपेरे और कालबेलिया समुदाय के लोग इस रात मंदाकिनी के एकांत तटों या कामदगिरि के घने जंगलों में बैठकर अपने सांप वशीकरण मंत्रों और जहर उतारने की विद्याओं का शुद्धीकरण व नवीनीकरण करेंगे। पुराने गुरु अपने शिष्यों को इसी रात गुप्त दीक्षा देंगे। इसके साथ ही, तंत्र मार्गी और अघोरी चित्रकूट के चक्रतीर्थ, अनुसूया आश्रम के समीपवर्ती जंगलों और गुप्त गोदावरी के पास छिपे स्थानों पर काल भैरव व मां काली की विशेष तांत्रिक पूजा (षटकर्म) करेंगे। लोग अपने ऊपर से नकारात्मक शक्तियों और तंत्र बाधाओं को हटाने के लिए भी यहां तांत्रिकों से झाड़-फूंक करवाएंगे।
इस मेले की एक अंतर्धारा भारत की प्राचीन तांत्रिक और कबीलाई संस्कृतियों से भी जुड़ी है। कार्तिक अमावस्या की काली रात (महानिशा) को तंत्र शास्त्र में बेहद शक्तिशाली माना गया है, जिसके कारण चित्रकूट के निर्जन जंगलों और घाटों पर कई रहस्यमयी अनुष्ठान संपन्न होंगे। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान से आने वाले सपेरे और कालबेलिया समुदाय के लोग इस रात मंदाकिनी के एकांत तटों या कामदगिरि के घने जंगलों में बैठकर अपने सांप वशीकरण मंत्रों और जहर उतारने की विद्याओं का शुद्धीकरण व नवीनीकरण करेंगे। पुराने गुरु अपने शिष्यों को इसी रात गुप्त दीक्षा देंगे। इसके साथ ही, तंत्र मार्गी और अघोरी चित्रकूट के चक्रतीर्थ, अनुसूया आश्रम के समीपवर्ती जंगलों और गुप्त गोदावरी के पास छिपे स्थानों पर काल भैरव व मां काली की विशेष तांत्रिक पूजा (षटकर्म) करेंगे। लोग अपने ऊपर से नकारात्मक शक्तियों और तंत्र बाधाओं को हटाने के लिए भी यहां तांत्रिकों से झाड़-फूंक करवाएंगे।
चित्रकूट का यह मेला विभिन्न समाजों की वार्षिक कुल पूजा का भी सबसे बड़ा केंद्र बनने जा रहा है। इसमें सबसे प्रमुख आकर्षण अहीर (यादव) समाज की मौनिया साधना होगी। इस समाज के पुरुष 12 वर्षों का कठिन मौन व्रत रखकर मोर पंख लिए रंग-बिरंगे कपड़ों में चित्रकूट पहुंचेंगे। कामदगिरि की परिक्रमा के बाद वे लाठियों के साथ बेहद ऊर्जावान 'दीवारी लोकनृत्य' करेंगे, जो उनके शौर्य और कुल परंपरा का प्रतीक है। वहीं, चित्रकूट के मूल निवासी कोल, भील और आदिवासी समुदाय के लोग अपने प्राचीन लोक देवताओं (जैसे दूल्हादेव, कारसदेव) की वार्षिक पूजा करेंगे और नई फसलों की सुरक्षा के लिए मन्नतें मांगेंगे। देश भर से आने वाले व्यापारी वर्ग (बनिया/साहू समाज) इस रात महालक्ष्मी के साथ-साथ चित्रगुप्त और कुबेर की विशेष 'गद्दी (बही-खाता) पूजा' करेंगे, जबकि मिट्टी के दीये बनाने वाले प्रजापति (कुम्हार) समाज के लोग मेले से पहले अपने चाक की विशेष पूजा कर आजीविका की समृद्धि की कामना करेंगे।
इस वर्ष पारंपरिक आस्था को आधुनिक तकनीक से भी जोड़ा जा रहा है। पहली बार मंदाकिनी नदी के रामघाट के आसमान में ५०० ड्रोनों की मदद से एक भव्य लाइट शो का आयोजन किया जाएगा। ३० मिनट के इस शो में आसमान में रामायण के प्रसंगों और रामचरितमानस की चौपाइयों की भव्य आकृतियां रोशनी के माध्यम से जीवंत होंगी। इसके अलावा, घाटों पर बड़ी एलईडी स्क्रीनों के माध्यम से श्रद्धालुओं को रामायण कथा दिखाई जाएगी और लोक कलाकारों द्वारा बुंदेली सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दी जाएंगी।
प्रशासनिक तैयारियां: सुरक्षा और बुनियादी व्यवस्थाओं को दिया जा रहा अंतिम रूप
चित्रकूट की भौगोलिक स्थिति उत्तर प्रदेश (चित्रकूट जिला) और मध्य प्रदेश (सतना जिला) दोनों सीमाओं में फैली होने के कारण, दोनों राज्यों का प्रशासन इस समय अंतर्राज्यीय समन्वय बैठकें कर सुरक्षा और सुविधाओं के कड़े इंतजामों को अंतिम रूप दे रहा है। पूरे मेला क्षेत्र को कई जोन और सेक्टरों में बांटकर भारी पुलिस बल और सीसीटीवी कैमरे तैनात किए जा रहे हैं। मंदाकिनी नदी के घाटों पर गहरे पानी में बैरिकेडिंग की जा रही है और श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए फ्लड पीएसी, प्रशिक्षित नाविक व गोताखोर २४ घंटे मुस्तैद रहेंगे। हाल ही में आई बाढ़ से क्षतिग्रस्त हुए पुलों व रास्तों की जगह अस्थाई पीपा पुल (Pontoon Bridges) तैयार किए जा रहे हैं। श्रद्धालुओं के वाहनों के लिए शहर की सीमाओं पर 17 बड़े पार्किंग स्थल और 6 भव्य प्रवेश द्वार बनाए जा रहे हैं। जगह-जगह मोबाइल मेडिकल यूनिट्स, एम्बुलेंस और स्वच्छ पेयजल के लिए वाटर कूलर लगाए जा रहे हैं। खाद्य सुरक्षा विभाग की टीमें मिलावटी मिठाइयों की जांच के लिए लगातार छापेमारी कर रही हैं। इसके साथ ही, सैकड़ों स्वयंसेवी संगठन (NGOs) श्रद्धालुओं के लिए भंडारे, निःशुल्क प्याऊ, चिकित्सा शिविर और खोया-पाया केंद्र संचालित करने की तैयारी में जुटे हैं।
चित्रकूट की भौगोलिक स्थिति उत्तर प्रदेश (चित्रकूट जिला) और मध्य प्रदेश (सतना जिला) दोनों सीमाओं में फैली होने के कारण, दोनों राज्यों का प्रशासन इस समय अंतर्राज्यीय समन्वय बैठकें कर सुरक्षा और सुविधाओं के कड़े इंतजामों को अंतिम रूप दे रहा है। पूरे मेला क्षेत्र को कई जोन और सेक्टरों में बांटकर भारी पुलिस बल और सीसीटीवी कैमरे तैनात किए जा रहे हैं। मंदाकिनी नदी के घाटों पर गहरे पानी में बैरिकेडिंग की जा रही है और श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए फ्लड पीएसी, प्रशिक्षित नाविक व गोताखोर २४ घंटे मुस्तैद रहेंगे। हाल ही में आई बाढ़ से क्षतिग्रस्त हुए पुलों व रास्तों की जगह अस्थाई पीपा पुल (Pontoon Bridges) तैयार किए जा रहे हैं। श्रद्धालुओं के वाहनों के लिए शहर की सीमाओं पर 17 बड़े पार्किंग स्थल और 6 भव्य प्रवेश द्वार बनाए जा रहे हैं। जगह-जगह मोबाइल मेडिकल यूनिट्स, एम्बुलेंस और स्वच्छ पेयजल के लिए वाटर कूलर लगाए जा रहे हैं। खाद्य सुरक्षा विभाग की टीमें मिलावटी मिठाइयों की जांच के लिए लगातार छापेमारी कर रही हैं। इसके साथ ही, सैकड़ों स्वयंसेवी संगठन (NGOs) श्रद्धालुओं के लिए भंडारे, निःशुल्क प्याऊ, चिकित्सा शिविर और खोया-पाया केंद्र संचालित करने की तैयारी में जुटे हैं।
बढ़ती चुनौतियां: पर्यावरणीय नुकसान और स्थानीय दिक्कतों की आशंका
इतने विशाल आयोजन के जहां स्थानीय व्यापार, कुम्हारों के रोज़गार और बुनियादी ढांचे के विकास के रूप में बड़े आर्थिक फायदे मिलेंगे, वहीं इसके कारण गंभीर चुनौतियां और नुकसान होने की भी पूरी आशंका है। सबसे बड़ा पर्यावरणीय दबाव मंदाकिनी नदी पर पड़ेगा, जहां लाखों लोगों के स्नान और दीपदान के तेल, घी व बत्तियों के कारण पवित्र जल अस्थायी रूप से प्रदूषित होगा। परिक्रमा मार्ग और घाटों पर बड़े पैमाने पर प्लास्टिक की बोतलें, रैपर्स और दोने-पत्तल का कचरा जमा होने की उम्मीद है, जिसे साफ़ करना प्रशासन के लिए टेढ़ी खीर साबित होगा। इसके अलावा, कड़े सुरक्षा घेरे, बैरिकेडिंग और 72 घंटे पहले से लागू होने वाले रूट डायवर्जन के कारण चित्रकूट के स्थानीय निवासियों का अपने ही घरों से निकलना और रोज़मर्रा के काम करना दूभर हो जाएगा, जिससे स्थानीय स्तर पर भारी असंतोष और तालाबंदी जैसी स्थिति बनने की आशंका है। अत्यधिक भीड़ के कारण कामदगिरि परिक्रमा मार्ग की संकरी गलियों में भगदड़ मचने या घाटों पर पैर फिसलने से डूबने जैसी दुर्घटनाओं का जोखिम भी हर समय बना रहेगा, जो प्रशासन के लिए एक बड़ी अग्निपरीक्षा साबित होने वाला है।
इतने विशाल आयोजन के जहां स्थानीय व्यापार, कुम्हारों के रोज़गार और बुनियादी ढांचे के विकास के रूप में बड़े आर्थिक फायदे मिलेंगे, वहीं इसके कारण गंभीर चुनौतियां और नुकसान होने की भी पूरी आशंका है। सबसे बड़ा पर्यावरणीय दबाव मंदाकिनी नदी पर पड़ेगा, जहां लाखों लोगों के स्नान और दीपदान के तेल, घी व बत्तियों के कारण पवित्र जल अस्थायी रूप से प्रदूषित होगा। परिक्रमा मार्ग और घाटों पर बड़े पैमाने पर प्लास्टिक की बोतलें, रैपर्स और दोने-पत्तल का कचरा जमा होने की उम्मीद है, जिसे साफ़ करना प्रशासन के लिए टेढ़ी खीर साबित होगा। इसके अलावा, कड़े सुरक्षा घेरे, बैरिकेडिंग और 72 घंटे पहले से लागू होने वाले रूट डायवर्जन के कारण चित्रकूट के स्थानीय निवासियों का अपने ही घरों से निकलना और रोज़मर्रा के काम करना दूभर हो जाएगा, जिससे स्थानीय स्तर पर भारी असंतोष और तालाबंदी जैसी स्थिति बनने की आशंका है। अत्यधिक भीड़ के कारण कामदगिरि परिक्रमा मार्ग की संकरी गलियों में भगदड़ मचने या घाटों पर पैर फिसलने से डूबने जैसी दुर्घटनाओं का जोखिम भी हर समय बना रहेगा, जो प्रशासन के लिए एक बड़ी अग्निपरीक्षा साबित होने वाला है।




No comments:
Post a Comment