झरनों की कल-कल, पहाड़ों की हरियाली और बादलों की चादर… प्रकृति ने सजाया चित्रकूट का अनुपम संसार
प्रशासन के वेतनभोगी क्रिएटर आखिर इन प्राकृतिक नजारों को देश-दुनिया तक क्यों नहीं पहुंचाते?
चित्रकूट।
बरसात आते ही 84 कोस श्री चित्रकूट धाम का स्वरूप बदल जाता है। विंध्य की पहाड़ियों पर उतरते बादल, चारों ओर फैली हरियाली, चट्टानों से उतरती जलधाराएं और झरनों की कल-कल—मानो प्रकृति स्वयं श्री चित्रकूट महात्म्य का नया अध्याय लिख रही हो।
गर्मियों में शांत दिखाई देने वाली पहाड़ियां बारिश में जीवंत हो उठती हैं। जंगलों के बीच से निकलती छोटी-बड़ी जलधाराएं झरनों का रूप ले लेती हैं और पूरा 84 कोस क्षेत्र प्रकृति प्रेमियों के लिए किसी खुले हुए प्राकृतिक चित्रशाला जैसा दिखाई देने लगता है।
बरसात में जाग उठते हैं चित्रकूट के झरने
84 कोस श्री चित्रकूट धाम और आसपास के विंध्य अंचल में बरसात के दौरान शबरी_राघव जलप्रपात, गुप्त गोदावरी क्षेत्र की जलधाराएं, हनुमान धारा क्षेत्र, स्फटिक शिला क्षेत्र तथा आसपास की पहाड़ियों के मौसमी झरने अपना अलग रूप दिखाते हैं।
इसी प्राकृतिक पट्टी को आगे बढ़ाएं तो रीवा-पन्ना अंचल के प्रसिद्ध जलप्रपात—बहुती, चचाई, क्योटी, पूर्वा और रनेह,बृहस्पतिकुंड जैसे जलप्रपात भी मानसून में अपनी पूरी भव्यता के साथ सामने आते हैं।
इन सभी प्राकृतिक स्थलों को अलग-अलग देखने के बजाय 84 कोस श्री चित्रकूट धाम और विंध्य प्राकृतिक पर्यटन परिक्षेत्र के व्यापक संदर्भ में प्रचारित किया जाए तो बरसात पर्यटन की एक नई संभावना पैदा हो सकती है।
प्रकृति ने मुफ्त में तैयार कर दिया पर्यटन का कंटेंट
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब प्रकृति ने इतना शानदार दृश्य बिना किसी खर्च के तैयार कर दिया है, तो इसे दुनिया तक पहुंचाने में कमी क्यों?
आज प्रशासन के पास सोशल मीडिया संभालने वाली टीमें, प्रचार-प्रसार के लिए बजट और वेतनभोगी डिजिटल क्रिएटर मौजूद हैं। फिर क्यों नहीं बरसात के दिनों में 84 कोस श्री चित्रकूट धाम के झरनों, पहाड़ियों, जंगलों और जलधाराओं का नियमित वीडियो डॉक्यूमेंटेशन किया जाता?
क्यों नहीं हर बारिश में एक “Monsoon Chitrakoot” डिजिटल अभियान चलाया जाता?
कैमरा सिर्फ कार्यक्रमों पर नहीं, प्रकृति पर भी जाए
सरकारी सोशल मीडिया पर बैठकों, निरीक्षणों, उद्घाटनों और अधिकारियों के कार्यक्रमों की तस्वीरें तो आसानी से दिखाई देती हैं, लेकिन पर्यटक के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल है—
“आज चित्रकूट में देखने लायक क्या है?”
कौन सा झरना बह रहा है?
कहां तक वाहन जा सकता है?
कहां पैदल जाना होगा?
कहां सुरक्षा व्यवस्था है?
कहां पानी खतरनाक है?
कहां परिवार के साथ जाया जा सकता है?
यदि इन सवालों के जवाब छोटे-छोटे वीडियो और तस्वीरों के साथ रोजाना सोशल मीडिया पर उपलब्ध हों तो यही सामग्री पर्यटन प्रचार का सबसे प्रभावी माध्यम बन सकती है।
84 कोस की प्राकृतिक परिक्रमा का डिजिटल दस्तावेज बने
84 कोस श्री चित्रकूट धाम केवल धार्मिक आस्था का क्षेत्र नहीं, बल्कि प्राकृतिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का भी विशाल भू-दृश्य है।
बरसात इसके प्राकृतिक सौंदर्य को कुछ सप्ताह के लिए चरम पर पहुंचा देती है। यह वह समय है जब पहाड़, जंगल, झरने, जलधाराएं और मंदाकिनी का परिवेश एक साथ चित्रकूट की अलग तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।
जरूरत है कि इस पूरे क्षेत्र का डिजिटल मैपिंग, ड्रोन डॉक्यूमेंटेशन, झरना सूचीकरण और सुरक्षित मानसून पर्यटन मार्ग तैयार किया जाए।
पर्यटन प्रचार में स्थानीय लोगों की भी भूमिका
स्थानीय युवाओं, फोटोग्राफरों, पत्रकारों और कंटेंट क्रिएटरों को जोड़कर “मेरा 84 कोस—मेरा चित्रकूट” जैसा अभियान चलाया जा सकता है। इससे स्थानीय प्रतिभाओं को अवसर मिलेगा और प्रशासन को लगातार नया स्थानीय कंटेंट भी उपलब्ध होगा।
लेकिन इसके लिए सबसे पहले प्रशासन को यह स्वीकार करना होगा कि चित्रकूट का सबसे बड़ा प्रचारक स्वयं चित्रकूट की प्रकृति है।
सवाल सीधा है…
जब 84 कोस श्री चित्रकूट धाम की पहाड़ियां बारिश में हरी चादर ओढ़ रही हों, झरने कल-कल बह रहे हों, बादल घाटियों में उतर रहे हों और प्रकृति पर्यटकों को बुला रही हो—तो फिर सरकारी कैमरे इन नजारों से दूर क्यों हैं?
वेतनभोगी क्रिएटरों का कैमरा आखिर कब कार्यक्रमों से निकलकर प्रकृति की ओर जाएगा?
चित्रकूट को केवल बताया नहीं जाना चाहिए—
बरसात में उसे दिखाया जाना चाहिए।
क्योंकि इस मौसम में 84 कोस श्री चित्रकूट धाम सिर्फ देखा नहीं जाता… महसूस किया जाता है।

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