दर्शन परिषद के 40वें राष्ट्रीय अधिवेशन का शुभारंभ, अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में 5 देशों की सहभागिता
📍 चित्रकूट
तपोभूमि चित्रकूट ने शुक्रवार को एक बार फिर अपने आध्यात्मिक वैभव का साक्षी दिया, जब विचार, ज्ञान और साधना का संगम अष्टावक्र सभागार में साकार हुआ। जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग राज्य विश्वविद्यालय में दर्शन परिषद के 40वें राष्ट्रीय अधिवेशन का शुभारंभ हुआ तो मानो प्राचीन ऋषि-परंपरा की प्रतिध्वनि वर्तमान में जीवंत हो उठी।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग, अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान, लखनऊ तथा भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद के संयुक्त तत्वावधान में अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का भी उद्घाटन किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ कुलपति प्रो. शिशिर कुमार पांडेय एवं मुख्य अतिथि प्रो. श्याम किशोर सेठ ने किया। कुलपति प्रो. पांडेय ने अपने उद्बोधन में कहा कि आज की वैश्विक अशांति का मूल कारण धर्म के वास्तविक स्वरूप को न समझ पाना है। भारतीय दर्शन इस उलझन को सुलझाने की क्षमता रखता है और आत्मिक शांति का मार्ग प्रशस्त करता है।
मुख्य अतिथि प्रो. एस.के. सेठ ने कहा कि आधुनिक मनुष्य बाहरी सुख में उलझकर आंतरिक शांति से दूर हो गया है। वास्तविक सुख आत्मबोध में निहित है, जिसे समझना आज की आवश्यकता है।
बीज वक्ता एवं पूर्व कुलपति प्रो. रजनीश शुक्ल ने कहा कि मनुष्य जीवन का अंतिम लक्ष्य आत्मा की प्रगति है तथा कामनाएं ही दुख का मूल कारण हैं। उन्होंने धर्म को मानव कल्याण और श्रेष्ठ आचरण का आधार बताया।
प्रो. लोकमान्य मिश्र ने वैश्विक शांति में दर्शन की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि वर्तमान संकटों का समाधान उच्च आत्मिक मूल्यों से ही संभव है।
कार्यक्रम के दौरान भारतीय दर्शन अनुसंधान परिषद की शोध पत्रिका ‘संदर्शन’ एवं डॉ. हरिकांत मिश्र की पुस्तक का विमोचन भी किया गया।
अंतरराष्ट्रीय स्वरूप को साकार करते हुए संगोष्ठी में 5 देशों के 10 विदेशी विद्वानों ने भाग लिया। अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान, लखनऊ के निदेशक डॉ. राकेश सिंह एवं अरुणेश मिश्र की उपस्थिति रही।
सायंकाल आयोजित सांस्कृतिक संध्या में भारतीय संस्कृति की विविध छवियां उभरकर सामने आईं, जिसका उद्घाटन पुलिस अधीक्षक डॉ. अरुण कुमार सिंह ने किया।
कार्यक्रम का सफल संचालन संयोजक डॉ. हरिकांत मिश्र के नेतृत्व में हुआ। उद्घाटन सत्र के बाद व्याख्यानमाला में पांच विद्वानों ने अपने विचार प्रस्तुत किए।
तपोभूमि चित्रकूट में जब दर्शन की यह ज्योति प्रज्वलित हुई, तो उसने यह संदेश भी दिया—
कि शांति की तलाश बाहर नहीं, भीतर के आलोक में ही संभव है।

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