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एक ऐसा स्थान जो विश्व भर के लोगो के लिये किंवदंतियों कथाओं कथानकों के साथ ही यथार्थ चेतना का पुंज बना हुआ है। प्रजापति ब्रह़मा के तपोबल से उत्पन्न पयस्वनी व मां अनुसुइया के दस हजार सालों के तप का परिणाम मां मंदाकिनी के साथ ही प्रभु श्री राम के ग्यारह वर्ष छह माह और अठारह दिनों के लिये चित्रकूट प्रवास के दौरान उनकी सेवा के लिये अयोध्या से आई मां सरयू की त्रिवेणी आज भी यहां पर लोगों को आनंद देने के साथ ही पापों के भक्षण करने का काम कर रही है।
Saturday, November 18, 2023
चित्रकूट अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन को लेकर उत्साह चरम पर,,बहने बाट रही पीले चावल
Thursday, March 9, 2023
चित्रकूट महिमा अमित,,,, चित्रकूट की श्री के प्रथम घोषक महर्षि वाल्मीकि
Tuesday, March 7, 2023
एक समग्र दृष्टिः क्या है चित्रकूट का अर्थ
अस्य चित्रकूटस्य्
इंतजार कीजिए कल तक,,,,,,,
Friday, March 3, 2023
हमारे महान ऋषि! त्रिकालदशी महर्षि देवल
घर वापसी के नियम बनाने वाले महर्षि देवल
एक ऐसा ऋषि जिसे यह पता था कि आने वाला कलियुग बहुत भयंकर होगा। ईसाई व मुस्लिम आक्रमणकारी तलवार के जोर पर या फिर लालच देकर सनातन धर्म के लोगों का धर्म परिवर्तन करवाएंगे। इसी दौरान सनातन में भी कुछ तेजस्वी निकलेंगे जो भटके हुए लोगों को फिर से घर वापसी कराकर उन्हें सनातन धर्मी बनाएंगे। सतयुग में ही महर्षि देवल ने देवल स्मृति नामक ग्रंथ लिख सनातन लोगों की घर वापसी के लिए नियम बनाकर यह बता दिया था कि चारों वर्णों के लोग कैसे तप करके अपने धर्म में प्रत्यावर्तित हो सकते हैं।
मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति में धर्म-भ्रष्ट मनुष्य को पुनः लेने के कोई प्रवंध नही है। ऐसे में जब भविष्य में मुस्लिम आक्रमणकारी तलवार के जोर पर सनातनियों का धर्म परिवर्तन करेंगे तो उनकी पुनः हिंदू धर्म में वापसी कैसे होगी, यह विचार तपस्यारत देवर्षि देवल को आया। उन्होंने भविष्य को देखकर तत्परता के साथ कुल 96 श्लोकों में देवल स्मृति की रचना कर यह सुनिश्चित किया कि अगर कोई सनातनी अपने घर वापसी करता है तो उसके लिए नियम क्या होंगे।
यह स्मृति सिन्ध पर मुसलमानी आक्रमण के कारण उत्पन्न धर्म परिवर्तन की समस्या के निवार्णार्थ लिखी गई थी। इसका रचनाकाल 7वीं शताब्दी से लेकर 10वीं शताब्दी के बीच होने का अनुमान है। कुछ इतिहासकारों द्वारा इसे प्रतिहार शासक मिहिर भोज के कालखंड का बताया है। इसमें केवल 96 श्लोक हैं। अनुमान है की सिंध प्रदेश के मुसलमानों के हाथ में चले जाने के बाद जब पश्चिमोतर भारत की जनता धड़ल्ले से मुसलमान बनायीं जाने लगी, तब उसे हिन्दू समाज में वापस आने की सुविधा देने के लिए इस स्मृति की रचना की गई।
याज्ञवल्क्य पर लिखी गई ‘मिताक्षरा’, अपरार्क, स्मृतिचन्द्रिका आदि ग्रंथों में देवल का उल्लेख किया गया है। उसी प्रकार देवल स्मृति के काफी उद्धरण ‘मिताक्षरा’ में लिये गये हैं। ‘स्मृतिचन्द्रिका’ में देवल स्मृति से ब्रह्मचारी के कर्तव्य, 48 वर्षो तक पाला जानेवाला ब्रह्मचर्य, पत्नी के कर्तव्य आदि के संबंध मे उद्धरण लिये गये हैं।
देवल स्मृति नामक 90 श्लोकों का ग्रंथ आनंदाश्रम में छपा है। उस ग्रंथ में केवल प्रायश्चित्तविधि बताया गया है। किंतु वह ग्रंथ मूल स्वरुप में अन्य स्मृतियों से लिये गये श्लोकों का संग्रह माना जाता है। इसका रचनाकाल भी काफी अर्वाचीन होगा क्योंकि इस स्मृति के 17-22 श्लोक तथा 30-31 श्लोक विष्णु के हैं, ऐसा अपरार्क में बताया गया है। अपरार्क तथा स्मृतिचन्द्रिका में ‘देव स्मृति’ से दायविभाग, स्त्रीधन पर रहनेवाली स्त्री की सत्ता आदि के बारे में उद्धरण लिये गये हैं। इससे प्रतीत होता है कि, स्मृतिकार देवल, बृहस्पति, कात्यायन आदि स्मृतिकारों का समकालीन रहे होंगे।
महर्षि देवल के बारे में प्रामाणिकता के साथ तो ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता है (कल्प व मन्वन्तर के अनुसार 3 देवल ऋषियों का वर्णन मिलता है परन्तु यह अभी शोध का विषय है कि किस देवल ने किस धाम पर तपस्या की थी ), परन्तु इस धाम के नाम और मान्यताओं के आधार पर कहा जा सकता है कि कौन से देवल नामक ऋषि ने चित्रकूट श्री कामदगिरि पर तपस्या की थी और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् सूर्य ने कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि को अपने बाल रूप में उन्हें दर्शन दिए थे, तभी से इस धाम का नाम देवल ऋषि के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
यह भी मान्यता है कि देवलास का प्राचीन नाम देवलार्क देवल ़अर्क था अर्थात देवल और अर्क (सूर्य) दोनों से मिलकर इस स्थान का नाम पड़ा।
देवल (प्रथम) -
हरिवंश पुराण के हरिवंश पर्व में अध्याय 3 श्लोक 44 व गरुण पुराण के आचार काण्ड में अध्याय 6 के अनुसार -
देवर्षि देवल, जिन्हें असित और असित देवल के नाम से भी जाना जाता है वह देवल ऋषि प्रत्यूष नाम के वसु के पुत्र थे। कुल आठ वसु (आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष, प्रभास) का उल्लेख मिलता है ।
देवल (द्वितीय) -
श्रीमद भागवद के छठवें स्कंध के छठें अध्याय के श्लोक 20 से -
कृशाश्वों दार्चिषि भार्यायं धूमकेशं जीजनत।
धीश गाया वेदशिरों देवल वमुन मनुम।।
दक्ष प्रजापति की धृश्णा नामक पुत्री थी जिसका विवाह कृशाश्व ऋषि से हुआ था जिनसे एक पुत्र हुआ उसका नाम देवल हुआ।
ऋषि देवल के बारे में अन्य कहानियां
(1) कुछ समय बाद जयगीशव्य नाम के एक ऋषि ने ऋषि देवल से संपर्क किया और अपनी दीक्षा को पूरा करने के लिए आश्रय का अनुरोध किया। देवल अपनी शक्तियों को जयगीशव्य को दिखाना चाहते थे और इसलिए उन्होंने असामान्य स्थानों का दौरा करना शुरू कर दिया, जहां उन्होंने आश्चर्यजनक रूप से पाया कि ऋषि जयगीशव्य उनसे बहुत पहले उन स्थानों का दौरा कर चुके थे। तभी उन्हें पता चल सका कि जयगीशव्य की शक्तियाँ क्या हैं। तब ऋषि जयगीशव्य ने ऋषि देवल को सादगी और उसकी संपूर्णता का अर्थ सिखाया।
(3) कुछ समय बाद ऋषि देवल ने हूहू नाम के एक गंधर्व को मगरमच्छ बनने का श्राप दिया, जब गंधर्व ने उसे एक तालाब में स्नान करते समय परेशान किया। इस प्रकार हूहू मगरमच्छ बन गया और विष्णु ने उसे मार डाला जब उसने गजेंद्र के पैर पकड़ लि।
(4) देवांग पुराण में, निर्माता भगवान ब्रह्मा ने दैवीय शक्तियों और मनुष्यों के लिए भी कपड़े बुनने के लिए ऋषि देवल की मदद ली। यद्यपि देवांग पुराण की हिंदू जीवन प्रणाली के पौराणिक क्रम में कोई प्रामाणिकता नहीं है, फिर भी, इस प्रकरण को हिंदू धर्म शास्त्र के कुछ ग्रंथों में प्रासंगिक माना गया था।
(4) एक बार रंभा - देवता की दिव्य नर्तकी ने अपने सुख के लिए ऋषि देवल को चाहा, जिसे ऋषि ने मना कर दिया। इस प्रकार, रंभा उससे क्रोधित हो गईं और उन्होंने ऋषि को निम्न जाति में जन्म लेने का श्राप दिया। इसीलिए, देवांग जाति में ऋषि देवल का जन्म हुआ और वे उस जाति के प्रधान व्यक्ति बने। उन्हें दिव्यांग, विमलंग और धवलंग नाम के तीन पुत्रों का आशीर्वाद मिला, जिन्होंने ऋषि को समाज के लाभ के लिए और दिव्य भगवानों के लाभ के लिए अद्भुत कपड़े बनाने और बनाने में मदद की।
(५) एक बार दिव्य ऋषि नारद जी ने ऋषि देवल से उन्हें स्पष्ट करने के लिए कहा कि ब्रह्मांड का जन्म कैसे होता है और जन्म और मृत्यु कैसे होती है और अंततः ब्रह्मांड का अंत कहां होता है। ऋषि देवल ने नारद जी को उत्तर दिया कि ब्रह्मांड का जन्म मूल पांच तत्वों - भूमि, वायु, अग्नि, जल और ब्रह्मांडीय प्रणाली से हुआ है। उन्होंने कहा कि सृष्टि और विनाश के लिए पांचों जिम्मेदार हैं। उन्होंने यह भी कहा कि शरीर भूमि से उत्पन्न होता है। ब्रह्मांडीय प्रणाली से कानय आग से आँखें हवा से जीवन और पानी से खून। दो आंख, नाक, दो कान, त्वचा, जीभ शरीर के पांच संवेदी अंग हैं। जबकि हाथ, पैर आदि पांच कर्मेंद्रियां हैं जो किसी को भी कर्म करने के लिए मजबूर करते हैं। इसलिए इस ऋषि द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण से शरीर और मन के सिद्धांत प्रकाश में आए हैं।
एक गंधर्व को देवल का अभिशाप
एक बार देवल ऋषि ने हूहू नाम के एक गंधर्व को ग्रह (मगरमच्छ) बनने का श्राप दिया। इसलिए वह ग्राह बन गया और एक तालाब में रहने लगा। एक बार एक गजेंद्र वहां पानी पीने आया तो उसने अपना पैर खींच लिया और उसे गहरे पानी में ले गया। गजेंद्र ने श्री हरि की प्रार्थना की, हरि ने आकर गजेंद्र को बचाया और ग्राह को मार डाला। जैसे ही हरि ने ग्राह को मारा, वह सबसे सुंदर गंधर्व बन गया। उन्होंने श्री हरि की पूजा की और अपने लोक में चले गए।
गजेन्द्र भी भगवान के समान चार भुजाओं वाला हो गया। वह अपने पिछले जन्म में एक पांड्य वंशी राजा थे। उसका नाम इंद्रद्युम्न था। वह भगवान का बहुत बड़ा भक्त था इसलिए एक बार उसने अपना राज्य त्याग दिया और संन्यासी बन गया। एक दिन वे श्री हरि की पूजा कर रहे थे कि अगस्त्य मुनि अपने शिष्यों के साथ आए। उसने देखा कि एक व्यक्ति जिसे गृहस्थ होना चाहिए, उसने अपने कर्तव्यों को त्याग दिया है और वहाँ बैठकर पूजा कर रहा है। वह क्रोधित हो गया और उसने उसे शाप दिया, कि उसने हाथी के समान मन से ब्राह्मण का अपमान किया है इसलिए उसे हाथी बनना चाहिए।
यह कहकर अगस्त्य मुनि चले गए और राजा ने इसे अपना भाग्य मान लिया। अगले जन्म में उनका जन्म गजेन्द्र के रूप में हुआ। यह गजेंद्र एक बार एक तालाब से पानी पीने गया था जहाँ ग्राह ने उसका पैर पकड़ लिया और उसे तालाब में खींच लिया। उन्होंने 1,000 साल तक लड़ाई लड़ी। जब हाथी मुक्त नहीं हो सका, तो उसने हरि की प्रार्थना की और हरि ने ग्राह को मारकर उसे मुक्त कर दिया। इस प्रकार हरि ने उसे अपने हाथी योनी से मुक्त किया और उसे अपना पार्षद नियुक्त किया, साथ ही ग्राह भी अपनी ग्रह योनि से मुक्त हो गया।
बीसवीं और इक्कीसवीं शताब्दी में सर्वाधिक चर्चित स्मृति रही है देवल स्मृति। इसमें हिन्दू से मुसलमान या ईसाई बने व्यक्ति या समूह को पुनः कैसे स्व धर्म में लाया जाए इसकी व्यवस्था दी गयी है।
देवलस्मृति का विरोध क्यों?
महर्षि देवल ने पतित या बलपूर्वक धर्मान्तरित व्यक्ति या समूह को कैसे पुनः सनातन पूजा पद्धत्ति (धर्म) में लाया जाए, इसकी व्यवस्था दी। इस व्यवस्था से सर्वाधिक परेशानी उन मजहबों को थी जो धर्मांतरण कराने में लगे थे और लगे हैं। अतः वे इसका सभी प्रकार से विरोध कर रहे थे।
दूसरा वर्ग वह था जो कट्टर धार्मिक था। जिसको नष्ट होते हिन्दू से लगाव नहीं था। घटती धार्मिक आबादी की जिनको चिंता नहीं थी।यह वर्ग बहुत प्रभावशाली और पूज्य होने के साथ साथ धार्मिक जगत में शीर्ष पर बैठा था। इसी वर्ग ने हिन्दू जनसंख्या को सर्वाधिक पीडि़त किया। यह वर्ग मालवीयजी और तिलकजी को भी सुनने को तैयार नहीं था।महर्षि देवल की चरणधूलि प्राप्त करने की योग्यता भी जिनमें नहीं थी वे उनकी स्मृति के विरुद्ध भाषण दे रहे थे।
यह काम धर्मशास्त्र से जुड़ा है पर विरोध करने वाले व्याकरण, साहित्य, दर्शन और अन्य विषय के थे। उनका आरोप था जो मुसलमान बन गया वह गोमांस खा लेता है। ऐसे व्यक्ति को हिन्दू नहीं बनाया जा सकता है। जबकि अगस्त्य ऋषि तो आतापी-वातापी राक्षस को भी खा कर पचा गए। उन्हें किसी ने धर्मबहिष्कृत नहीं किया। अंग्रेजों का काम धार्मिक विद्वान ही कर रहा था।
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देवल स्मृति के अनुसार घर वापसी के नियम
धर्म भ्रष्टता के चार प्रकार 1-सुरा पान 2-गोमांस भक्षण 3-म्लेक्ष से दूषित 4-विधर्मी स्त्री-पुरुष से सम्बन्ध।
शुद्धि का वार्षिक उपाय - एक वर्ष तक चांद्रायण कर पराक व्रत करने वाला ब्राह्मण पुनःहिन्दू विप्र हो जाएगा। अन्य जाति का व्यक्ति इससे कम प्रायश्चित करेगा। यदि क्षत्रिय है तो वह एक पराक और एक कृच्छ्र व्रत करके ही शुद्ध हो जाएगा। वैश्य व्यक्ति आधा पराक व्रत से पुनः हिन्दू हो जाएगा। शूद्र व्यक्ति पांच दिन के उपवास से शुद्ध हो जाएगा। शुद्धि के अंतिम दिन बाल और नाखून अवश्य कटवाना चाहिए।(देवलस्मृति,7-10)
ब्राह्मण प्रायश्चित्त करके गो दान, स्वर्ण दान भी करे।(श्लोक13) इतना कर लेने के बाद उसे सपरिवार भोजन में पंक्ति देनी चाहिए कृ पंक्तिम् प्राप्नोति नान्यथा।(श्लोक14)
कोई समूह यदि एक वर्ष या इससे ज्यादा दिनों तक धर्मान्तरित रह गया हो तो उसे शुद्धि, वपन, दानके अलावा गंगा स्नान भी करना चाहिए-गंगास्नानेन शुध्यति।(15)।
विप्रों को सिंधु,सौबीर, बंग, कलिंग, महाराष्ट्र, कोंकण तथा सीमा पर जा कर शुद्धि करनी चाहिए।(श्लोक16)।
बेजोड़ चिंतन- बलपूर्वक दासी बनाने पर, गो हत्या कराने पर, जबरदस्ती कामवासना पूरा कराने पर, उनका जूठा सेवन कराने पर प्रजापत्य, चांद्रायण, आहिताग्नि तथा पराक व्रत से शुद्धि होगी। पन्द्रह दिन यव पीने से पुनः हिन्दू होगा।
कम पढ़ा लिखा व्यक्ति एक मास तक हाथ में कुशा लेकर चले और सत्य बोले तो वह शुद्ध हो अपने धर्म में प्रतिष्ठित हो जाएगा।।
आज से 52 सौ वर्ष पहले देवल ऋषि ने दी थी। इस व्यवस्था का पालन कर सनातन धर्मियों की फिर से हिंदू धर्म में वापसी कराई जा सकती है।
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| श्री महंत वरूण प्रपन्नाचार्य जी महराज, बड़ा मठ, रामघाट चित्रकूट |
हिंदू वास्तव में एक संस्कृति का नाम है, जिसे आसानी से दबाया नही जा सकता। हम लोग सदियों से हैं और रहेंगे, यह बात और है कि लगातार बाहर से आने वालों ने हमें दबाने और धर्म परिवर्तित करने के लिए मजबूर किया। तलवार के जोर पर कुछ लोग परिवर्तित भी हुए। लेकिन धन्य हैं ऐसे ऋषि देवल जिन्होंने सतयुग में ही इस समस्या को देखकर वापस सनातनी बनने के लिए नियम कायदे बनाए। हम उनको बारंबार नमन करते हैं।
संदीप रिछारिया
Thursday, March 2, 2023
Saturday, February 25, 2023
ऋग्वेद के मंत्र दृष्टा महर्षि वामदेव
वृहद चित्रकूट महात्म के अनुसार श्री चित्रकूटधाम की सीमा 84 कोस परिक्षेत्र की है। यह परिधि कर्णावति यानि केन नदी की सीमा से होकर जाती है। इसलिए चित्रकूट परिक्षेत्र के अंन्र्तगत आने वाले बांदा का नाम वर्तमान में चित्रकूटधाम मंडल के नाम से विख्यात है। हमारे महान ऋषियों की श्रंखला में आज हम बात कर रहे हैं महर्षि वामदेव की, वही वामदेव जिन्होंने अपने जन्म के पहले अपने पूर्व जन्मों का पता कर लिया। गुरू ब्रहस्पति की खोज तारे के रूप में कर दी।वृहद चित्रकूट महात्म के अनुसार श्री चित्रकूटधाम की सीमा 84 कोस परिक्षेत्र की है। यह परिधि कर्णावति यानि केन नदी की सीमा से होकर जाती है। इसलिए चित्रकूट परिक्षेत्र के अंन्र्तगत आने वाले बांदा का नाम वर्तमान में चित्रकूटधाम मंडल के नाम से विख्यात है। हमारे महान ऋषियों की श्रंखला में आज हम बात कर रहे हैं महर्षि वामदेव की, वही वामदेव जिन्होंने अपने जन्म के पहले अपने पूर्व जन्मों का पता कर लिया। गुरू ब्रहस्पति की खोज तारे के रूप में कर दी। ऋग्वेद के मंत्र दृष्टा ऋषि है। महर्षि वामदेव द्वारा सेविता भूमि बांदा इसलिए वंदनीय और पूज्यनीय है क्योंकि यहां पर ब्रहृमा जी के द्वारा प्रकट किए गए महर्षि वामदेव ने अपने उग्रतप से भगवान भोलेनाथ का उग्र तप कर स्वयं को उनमें समाहित कर स्वयं वामदेवेश्वर हो गए। उन्होंने सामवेद के माध्यम से संगीत के सात स्वरों की रचना कर हमें इस योग्य बनाया कि हम संगीत सुनकर आनंदित हो सकें। सामवेद भी उनका ही दृष्टव्य है। महर्षि वामदेव द्वारा सेविता भूमि बांदा इसलिए वंदनीय और पूज्यनीय है क्योंकि यहां पर ब्रहृमा जी के द्वारा प्रकट किए गए महर्षि वामदेव ने अपने उग्रतप से भगवान भोलेनाथ का उग्र तप कर स्वयं को उनमें समाहित कर स्वयं वामदेवेश्वर हो गए। उन्होंने सामवेद के माध्यम से संगीत के सात स्वरों की रचना कर हमें इस योग्य बनाया कि हम संगीत सुनकर आनंदित हो सकें। सामवेद भी उनका ही दृष्टव्य है।
चित्रकूट के महान ऋषि
महर्षि वामदेव
- ऋग्वेद के मंत्र दृष्टा ऋषि हैं
- बृहस्पति ग्रह की खोज करने वाले पहले ऋषि
- जिन्हें गर्भ में ही हो गया था पूर्व के दो जन्मों का ज्ञान
संदीप रिछारिया
धर्मक्षेत्रे। महर्षि वामदेव ऋग्वेद के चैथे मंडल के मंत्रद्रष्टा ऋषि हैं। चैथे मंडल में कुल 58 सूक्त हैं। जिसमें महर्षि ने अग्नि, इन्द्र, वरुण, सोम, रिभु दधिकाष्ण, विश्वेदेव और उषा आदि देवताओं की स्तुति की है। उन स्तुतियों में लोक कल्याण की उदात्त भावना समाहित है। महर्षि वामदेव ब्रह्मज्ञानी और जाति- स्मरणीय महात्मा रहे हैं। वायु पुराण में कहा गया है कि उन्होंने अपने ज्ञान से ऋषि का पद प्राप्त किया था- ज्ञानतो ऋषितम गतः (वायु 59.91)। ऋग्वेद में ऋषि ने स्वयं अपना परिचय दिया है, जिसके अनुसार स्पष्ट होता है कि गर्भ में ही उनका आम लोगों और ब्रह्मविद्या से साक्षात्कार हुआ था। उन्होंने ऋग्वेद के विनम्र ऋचाक को अपनी माता के गर्भ में देखा था। इसलिए, उसने अपनी माँ के गर्भ में कहा जब मैंने देवताओं के गर्भ में जन्म लिया, तो मैंने एक सौ देवताओं को जन्म दिया।
ऋचा का भाव यह है कि अहो कितने आनन्द की बात है कि गर्भ में रहते-रहते ही मैंने इन अन्तःकरण और इन्द्रियरूप देवताओं व अनेक जन्मोंका रहस्य भलीभाँति जान लिया अर्थात् में इस बातको जान गया कि ये जन्म आदि वास्तव में इन अन्तःकरण और इन्द्रियोंक हो होते हैं, आत्मा नहीं। इस रहस्यको समझने से पहले मुझे सैकड़ों लोहे के समान कठोर शरीर रूपी पिंजरों में अवरुद्ध कर रखा था। उनमें मेरी ऐसी दृढ़ अहंता हो गयी थी कि उससे छूटना मेरे लिए कठिन हो रहा है। यही मोहपाश है।
वामदेव ऋषि के बारे में कुछ तथ्य
ऋषि वामदेव गौतम ऋषि के पुत्र थे इसीलिए उन्हें गौतमेय भी कहा जाता था। वामदेव जब मां के गर्भ में थे तभी से उन्हें अपने पूर्वजन्म आदि का ज्ञान हो गया था। वामदेव जब मां के गर्भ में थे तभी से उन्हें अपने पूर्वजन्म आदि का ज्ञान हो गया था। उन्होंने सोचा, मां की योनि से तो सभी जन्म लेते हैं और यह कष्टकर है, अतः मां का पेट फाड़ कर बाहर निकलना चाहिए। वामदेव की मां को इसका आभास हो गया। अतः उन्होंने अपने जीवन को संकट में पड़ा जानकर देवी अदिति से रक्षा की कामना की। तब वामदेव ने इंद्र को अपने समस्त ज्ञान का परिचय देकर योग से श्येन पक्षी का रूप धारण किया तथा अपनी माता के उदर से बिना कष्ट दिए बाहर निकल आए।
ऋषि वामदेव के कुछ आश्चर्यजनक तथ्य
1. वामदेव अपने पिछले जन्म में मनु, ऋषि कक्षीवत (कक्षीवान) और कवि उशना थे।
2. वामदेव ने इस देश को सामगान (अर्थात् संगीत) दिया तथा वे जन्मत्रयी के तत्ववेत्ता माने जाते हैं। भरत मुनि द्वारा रचित भरत नाट्य शास्त्र सामवेद से ही प्रेरित है। हजारों वर्ष पूर्व लिखे गए सामवेद में संगीत और वाद्य यंत्रों की संपूर्ण जानकारी मिलती है।
3. वामदेव ऋग्वेद के चतुर्थ मंडल के सूत्तद्रष्टा थे।
4. एक बार इंद्र ने युद्ध के लिए वामदेव को ललकारा था तब इंद्रदेव परास्त हो गए। वामदेव ने देवताओं से कहा कि मुझे दस दुधारु गाय देनी और मेरे शत्रुओं को परास्त करना होगा तभी में इंद्र को मुक्त करूंगा। इंद्र और सभी देवता इस शर्त से कुतिप हो चले थे। बाद में वामदेव ने इंद्र की स्तुति करके उन्हें शांत कर दिया था।
5. एक ऐसा भी वक्त आया की वामदेव निर्धन हो चले थे तब उनके सभी मित्रों से उनसे मुंह मोड़ लिया था। आश्रम के सभी फलदार पेड़ पौधे सूख गए थे। उनका तपोबल भी क्षीण हो चला था। पत्नी के अतिरिक्त सभी ने वामदेव ऋषि का साथ छोड़ दिया था। खाने के लाले पड़ गए थे। तब इंद्र ने उनकी सहायता करके उन्हें तृप्त किया था।
6. वामदेव शिवजी के भक्त थे और में शरीर पर भस्म धारण करते थे। एक बार एक ब्रह्मराक्षस उन्हें खाने आया और ज्यों ही वामनेव को पकड़ा तो उसके शरीर पर भस्म लग गई। भस्म लगने से उसके पापों का नाश हो गए तथा उसे शिवलोक की प्राप्ति हुई। वामदेव के पूछने पर उस ब्रह्मराक्षस ने बताया कि वह पच्चीस जन्म पूर्व दुर्जन नामक राजा था, अनाचारों के कारण मरने के बाद वह रुधिर कूप में डाल दिया गया। फिर चैबीस बार जन्म लेने के उपरांत वह ब्रह्मराक्षस बना।
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अथ् मार्कण्डेय उवाच,,,,
युधिष्ठिर के आग्रह करने पर मार्कण्डेय बताते है कि राजा परीक्षित का मण्डूकराज की कन्या से विवाह होता है और अब शल और दल के चरित्र तथा वामदेव मुनि की महत्ता के बारे में बताया गया है, जिसका उल्लेख महाभारत वनपर्व के मार्कण्डेयसमस्या पर्व के अंतर्गत अध्याय 192 में बताया गया है।
मार्कण्डेय द्वारा राजा शल का चरित्र वर्णन
मार्कण्डेय कहते हैं- राजन! तदनन्तर एक दिन महाराज शल शिकार खेलने के लिये वन को गये। वहाँ उन्होंने एक हिंसक पशु को सामने पाकर रथ के द्वारा ही उस का पीछा किया और सारथि से कहा- शीघ्र मुझे मृग के निकट पहुँचाओं। उनके ऐसा कहने पर सारथि बोला- महाराज! आप इस पशु को पकड़ने का आग्रह न करें। यह आप की पकड़ में नहीं आ सकता। यदि आप के रथ में दोनों वाक्य घोड़े जुते होते, तब आप इसे पकड़ लेते। यह सुनकर राजा ने सूत से पूछा- सारथे! बताओ, वाम्य घोड़े कौन हैं, अन्यथा मैं तुम्हें अभी मार डालूंगा। राजा के ऐसा कहने पर सारथि भय से कांप उठा। उधर घोड़ों का परिचय देने पर उसे वामदेव ऋषि के शाप का भी डर था। अतः उसने राजा से कुछ नहीं कहा। तब राजा ने पुनः तलवार उठाकर कहा- अरे! शीघ्र बता, नही तो तुझे अभी मार डालूंगा। तब उसने राजा के भय से त्रस्त होकर कहा- महाराज! वामदेव मुनि के पास दो घोड़े हैं जिन्हें वाम्य कहते हैं। वे मन के समान वेगशाली हैं। सारथि के ऐसा कहने पर राजा ने उसे आज्ञा दी, चलो वामदेव के आश्रम पर पहुँचकर राजा ने उन महर्षि से कहा- भगवन! मेरे बाणों से घायल हुआ हिंसक पशु भागा जा रहा हैं। आप अपने वाम्य अश्व मुझे देने की कृपा करें।
तब महर्षि ने कहा- मैं तुम्हें वाम्य अश्व दिये देता हूँ। परंतु जब तुम्हारा कार्य सिद्ध हो जाय, तब तुम शीघ्र ही ये दोनो अश्व मुझे ही लौटा देना। राजा ने दोनों अश्व पाकर ऋषि की आज्ञा ले वहाँ से प्रस्थान किया। वामी घोड़ो से जुते हुए रथ के द्वारा हिंसक पशु का पीछा करते हुए वे सारथि से बोले- सूत! ये दोनों अश्वरत्न ब्राह्मणों के पास रहने योग्य नहीं हैं। ऐसा कह कर राजा हिंसक पशु को साथ ले अपनी राजधानी को चल दिये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने उन दोनों अश्वों को अन्तःपुर में बांध दिया। उधर वामदेव मुनि मन-ही-मन इस प्रकार चिन्ता करने लगे- वह तरुण राजकुमार मेरे अच्छे घोड़ो को लेकर मौज कर रहा हैं, उन्हें लौटाने का नाम ही नहीं लेता हैं। यह तो बड़े कष्ट की बात है! जब एक मास पूरा हो गया, तब वे अपने शिष्य से बोले- आत्रेय! जाकर राजा से कहो कि यदि काम पूरा हो गया हो तो गुरु जी के दोनों वाम्य अश्व लौटा दीजिये। शिष्य ने जाकर राजा से यही बात दुहरायी। तब राजा ने उसे उत्तर देते हुए कहा- यह सवारी राजाओं के योग्य हैं। ब्राह्मणों को ऐसे रत्न रखने का अधिकार नहीं हैं। भला, ब्राह्मणों को घोड़े लेकर क्या करना हैं? अब आप सकुशल पधारिये। शिष्य ने लौट कर ये सारी बातें अपने गुरू से कहीं। वह अप्रिय वचन सुनकर वामदेव मन-ही-मन क्रोध से जल उठे और स्वयं ही उस राजा के पास जाकर उन्हें घोड़े लौटा देने के लिये कहा। परंतु राजा ने वे घोड़े नहीं दिये।
वामदेव मुनि की महत्ता का वर्णन
ऋषि वामदेव ने कहा- राजन! मेरे वाक्य अश्वों को अब मुझे लौटा दो। निश्चय ही उन घोड़ो द्वारा तुम्हारा असाध्य कार्य पूरा हो गया हैं। कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी असत्य वादिता के कारण राजा वरुण तुम्हें अपने भयंकर पाशों से बांध ले। राजा बोले- वामदेव जी! ये दो अच्छे स्वभाव के सीखे-सिखाये हष्ट-पुष्ट बैल हैं, जो गाड़ी खींच सकते हैं, ये ही ब्राह्मणों के लिये उचित वाहन हो सकते हैं। अतः महर्षें! इन्हीं को गाड़ी में जोत कर आप जहाँ चाहें जायं। आप-जैसे महात्मा का भार तो वेद-मंत्र ही वहन करते हैं। वामदेव ने कहा- राजन! इसमें संदेह नहीं कि हम-जैसे लोगों के लिये वेद के मंत्र ही वाहन का काम देते हैं। परंतु वे परलोक में ही उपलब्ध होते हैं। इस लोक में तो हम-जैसे लोगों के तथा दूसरों के लिये भी ये अश्व ही वाहन होते हैं। राजा ने कहा-ब्रह्मन्! तब चार गधे, अच्छी जाति की खच्चरियां या वायु के समान वेगशाली दूसरे घोड़े आपकी सवारी के लिये प्रस्तुत हो सकते हैं। इन्हीं वाहनों द्वारा आप यात्रा करें। यह वाहन, जिसे आप मांगने आये हैं, क्षत्रिय नरेश के ही योग्य हैं। इसलिये आप यह समझ लें कि ये वाम्य अश्व मेरे ही हैं, आप के नहीं हैं। वामदेव बोले- राजन! तुम ब्राह्मणों के इस धन को हड़प कर जो अपने उपयोग में लाना चाहते हो, यह बड़ा भयंकर कर्म कहा गया हैं। यदि मेरे घोड़े वापस न दोगे तो मेरी आज्ञा पाकर विकराल रूपधारी तथा लौह-शरीर वाले अत्यन्त भयंकर चार बड़े-बड़े राक्षस हाथों में तीखे त्रिशूल लिये तुम्हारे वध की इच्छा से टूट पड़ेंगे और तुम्हारे शरीर के चार टुकड़े करके उठा ले जायंगे।
राजा ने कहा- वामदेव जी! आप ब्राह्मण हैं तो भी मन, वाणी एवं क्रिया द्वारा मुझे मारने को उद्यत हैं, इसका पता हमारे जिन सेवकों को चल गया हैं, वे मेरी आज्ञा पाते ही हाथों में तीखे त्रिशूल तथा तलवार लेकर शिष्यों सहित आपको पहले ही यहाँ मार गिरावेंगे। वामदेव बोले-राजन! तुमने जब ये मेरे दोनों घोड़े लिये थे, उस समय यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं इन्हें पुनः लौटा दूंगा। ऐसी दशा में यदि आपने आप को तुम जीवित रखना चाहते हो, तो मेरे दोनों वाम्य संज्ञक घोड़े वापस दे दो। राजा बोले- ब्रह्मन! ब्राह्मणों के लिये शिकार खेलने की विधि नहीं हैं। यद्यपि आप मिथ्यावादी हैं, तो भी मैं आपको दण्ड नहीं दूंगा और आज से आप के सारे आदेशों का पालन करूंगा, जिससे मुझे पुण्यलोक की प्राप्ति हो। वामदेवने कहा- राजन! मन, वाणी अथवा क्रिया द्वारा कोई भी अनुशासन या दण्ड ब्राह्मणों पर लागू नहीं हो सकता। जो इस प्रकार जान कर कष्ट सहनपूर्वक ब्राह्मण की सेवा करता हैं। वह उस ब्राह्मण-सेवारूप कर्म से ही श्रेष्ठ होता और जीवित रहता हैं।
मार्कण्डेय जी कहते हैं- राजन! वामदेव की यह बात पूर्ण होते ही विकराल रूपधारी चार राक्षस वहाँ प्रकट हो गये। उनके हाथ में त्रिशूल थे। जब वे राजा पर चोट करने लगे, तब राजा ने उच्च स्वर से यह बात कही- यदि ये इक्ष्वाकुवंश के लोग तथा मेरे आज्ञा पालक प्रजावर्ग के मनुष्य भी त्याग कर दें, तो भी मैं वामदेव के इन वाम्य संज्ञक घोड़ो को कदापि नहीं दूंगाय क्योंकि इनके-जैसे लोग धर्मात्मा नहीं होते हैंश्। ऐसा कहते ही राजा शल उन राक्षसों से मारे जाकर तुरंत धराशायी हो गये। इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रियों को जब यह मालूम हुआ कि राजा मार गिराये गये, तब उन्होंने उनके छोटे भाई दल का राज्याभिषेक कर दिया। तब पुनः उस राज्य में जाकर विप्रवर वाम देव ने राजा दल से यह बात कही- महाराज! ब्राह्मणों की वस्तु उन्हें दे दी जाय, यह बात सभी धर्मों में देखी गयी हैं।
राजा दल के चरित्र का वर्णन
नरेन्द्र! यदि तुम अधर्मसे डरते हो तो मुझे अभी शीघ्रतापूर्वक मेरे वाम्य अश्वों को लौटा दो। वामदेव की यह बात सुनकर राजा ने रोषपूर्वक अपने सारथि से कहा- श्सूत! एक अद्भुत बाण ले आओ, जो विषय में बुझकर रखा गया हो। जिससे घायल होकर यह वामदेव धरती पर लोट जाय। इसे कुत्ते नोच-नोचकर खायं और यह पृथ्वी पर पड़ा-पड़ा पीड़ा से छटपटाता रहेश्। वामदेव ने कहा-नरेन्द्र! मैं जानता हूं, तुम्हारी रानी के गर्भ से श्येनजित नामक एक पुत्र पैदा हुआ हैं, जो तुम्हें बहुत प्रिय है और जिसकी अवस्था दस वर्ष की हो गयी है। तुम मेरी आज्ञा से प्रेरित होकर इन भयंकर बाणों द्वारा अपनी उसी पुत्र का शीघ्र वध करोंगे।
मार्कण्डेय जी कहते हैं- राजन! वामदेवके ऐसा कहते ही उस प्रचण्ड तेजस्वी बाण ने धनुष से छूटकर रनवास के भीतर जा राजकुमार का वध कर डाला। यह समाचार सुनकर दल ने वहाँ पुनः इस प्रकार कहा। राजा ने कहा- इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रियो! मैं अभी तुम्हारा प्रिय करता हूँ। आज इस ब्राह्मण को रौंद कर मार डालूंगा। एक दूसरा तेजस्वी बाण ले आओ और आज मेरा पराक्रम देखो। वामदेव जी ने कहा- नरेश्वर! तुम विष के बुझाये हुए इस विकराल बाण को मुझे मारने के लिये धनुष पर चढ़ा रहे हो, परंतु कहे देता हूँ इस बाण को न तो तुम धनुष पर रख सकोगे और न छोड़ ही सकोगेश्। राजा बोले- इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रियो! देखो, मैं फंस गया। अब यह बाण नहीं छोड़ सकूंगा। इसलिये वामदेव को नष्ट करने का उत्साह जाता रहा। अतः यह महर्षि दीर्घायु होकर जीवित रहे। वामदेव जी ने कहा-राजन! तुम इस बाण से अपनी रानी का स्पर्श कर लेने पर ब्रह्महत्या के पाप से छूट जाओगे। तब राजा ने ऐसा ही किया। राजपुत्री बोली- वामदेव जी! मैं इन कठोर स्वभाव वाले अपने स्वामी को प्रतिदिन सावधान रहकर मीठे वचन बोलने की सलाह देती रहती हूँ और स्वयं ब्राह्मणों की सेवा का अवसर ढूंढ़ती हूँ। ब्रह्मन! इन सत्कर्मों के कारण मुझे पुण्यलोक की प्राप्ति हो। वामदेव ने कहा- शुभ दृष्टिवाली अनिन्द्य राजकुमारी! तुमने इस राजकुल को ब्राह्मण के कोप से बचा लिया। इस के लिये कोई अनुपम वर मांगो। मैं तुम्हें अवश्य दूंगा। तुम इन स्वजनों के हृदय और विशाल इक्ष्वाकु राज्य पर शासन करो।राजकुमारी बोली- भगवन! में यही चाहती हूँ कि मेरे ये पति आज सब पापों से छुटकारा पा जाएँ। आप ये आशीर्वाद दें कि ये पुत्र और बन्धु-बान्धवों सहित सुख से रहें। विप्रवर! मैंने आप से यही वर माँगा है।
मार्कण्डेय जी कहते हैं- कुरु कुल के प्रमुख वीर युधिष्ठिर! राज पुत्री की यह बात सुनकर वामदेव मुनि ने कहा- ‘ऐसा ही होगा।’ तब राजा दल बड़े प्रसन्न हुए और महर्षि को प्रणाम करके वे दोनों वाम्य अश्व उन्हें लौटा दिये।
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