चित्रकूट। इस परिक्षेत्र का आध्यात्मिक, धार्मिक के साथ ही सांस्कृतिक वैभव अपने आपमें अनूठा है। धर्म नगरी का दर्शन जहां शांति और वैराग्य का संदेश देता है वहीं कर्वी नगर में स्थापत्य कला पर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के स्वरुप दिखाई देते हैं। ऐसा ही एक स्थान जिला मुख्यालय से लगे सोनेपुर गांव के समीप 'गणेश बाग' है। भले ही अभी भी इस विशिष्ट स्थान पर देशी और विदेशी पर्यटकों की आवक उतनी न बन पाई हो जितनी की उम्मीद की जाती है पर इतना तो साफ है कि सांस्कृतिक विरासत का धनी स्थान अपने आपमें काफी विशिष्टतायें समेटे हुये है। भले ही इस स्थान का नाम गणेश बाग हो पर यहां पर श्री गणेश की स्थापित एक भी मूर्ति नही है। मूर्ति चोरों की बुरी नजर का परिणाम श्री गणेश की प्रतिमा ही नही बल्कि अन्य विशेष स्थापत्य कला की मूर्तियां बाहर जा चुकी है।
जिला चिकित्सालय के ठीक पीछे को कोटि तीर्थ जाने के मार्ग पर स्थित गणेश बाग के बनने की कहानी भी कम रोचक नही है। मराठा राजवंश की बहू जय श्री जोग बताती हैं कि उनका खानदान प्लासी के युद्ध के बाद बेसिन की संधि में यह क्षेत्र में मिलने के बाद यहां पर आया था। उनके पुरखे पेशवा अमृत राव को कुआं तालाब बाबड़ी आदि बनवाने का काफी शौक था। वैसे उस समय इस शहर का नाम अमृत नगर हुआ करता था। पानी की विशेष दिक्कत होने के कारण भी पानी की व्यवस्था सुचारु रूप से किये जाने के प्रबंध किये गये थे।
महाराष्ट्र से लाल्लुक रखने के कारण श्री गणेश की आराधना उनके खानदान में होती थी। यहां पर इस मंदिर के साथ ही तालाब व बावड़ी का निर्माण कराने के साथ ही विशाल अस्तबल का भी निर्माण कराया गया था।
महात्मा गांधी चित्रकूट गांधी विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डा. कमलेश थापक कहते हैं कि बेसिन की संधि के बाद मराठों ने बांदा और चित्रकूट में आकर अपना साम्राज्य स्थापित किया। उनके आने से जहां कुछ नई परंपरायें समाप्त हुयी वहीं मंदिरों, कुओं, तालाबों व बाबडियों का भी निर्माण हुआ।
गणेश बाग भी स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। यहां पर स्थापित मूर्तियां खजुराहो शिल्प की तरह ही हैं। पांच मंदिरों के समूह के साथ ही तालाब व अन्य भवन कभी अपने वैभव रहने की की कहानी कहते हैं, पर समय बदलने और आधुनिकता का रंग चढ़ने पर आज यह विशेष स्थान दुर्दशा को प्राप्त हो रहा है। सरकारी स्तर पर किये गये प्रयास नाकाफी है और किसी भी जन प्रतिनिधि को यहां के सांस्कृतिक गौरवों के उत्थान की याद ही नही आती।
सामाजिक चिंतक आलोक द्विवेदी कहते हैं कि सरकार के पास पैसा बेकार के कामों के लिये बहाने को तो है पर गणेश बाग के विकास के लिये शायद नही है।
भारतीय पुरातत्व विभाग का एक बोर्ड और चंद चौकीदार ही इसके संरक्षण और संर्वधन के जिम्मेदार बने हुये हैं। सरकारी योजनायें इसके उत्थान के लिये तो बनी पर उनसे गणेश बाग की दशा और दिशा के साथ ही पर्यटकों की आवक नही बढ़ सकी। अगर वास्तव में सही मंशा से गणेश बाग का विकास किया जाये तो पर्यटक यहां पर भी आकर आनंदित महसूस करेंगे। खजुराहो शिल्प की तरह ही इस मंदिर का इतिहास अपने आपमें स्वतंत्रता संग्राम के अमर सेनानी चंद्र शेखर आजाद के यहां पर कई बार रहने का भी गवाह है, पर दुर्भाग्य इस बात का है कि कभी भी किसी ने इस तरह का जिक्र गणेश बाग की इमारत के अंदर बोर्ड लगाकर किया ही नही। पेशवाओं के बनवाये तमाम मकान खंडहर होते रहे और पर्यटक विभाग भी मूक दर्शक की भांति अपनी कार्य कुशलता सिद्ध करता रहा।
वैसे फरवरी के महीने में महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय के प्रांगण मे आयोजित विश्व यू 3 ए कांफ्रेंस का समापन गणेश बाग में आयोजित कर आयुष्मान ग्रुप ने यहां पर देशी और विदेशी पर्यटकों को लाकर पर्यटकों की आमद बढ़ाने का प्रयास किया था।
एक ऐसा स्थान जो विश्व भर के लोगो के लिये किंवदंतियों कथाओं कथानकों के साथ ही यथार्थ चेतना का पुंज बना हुआ है। प्रजापति ब्रह़मा के तपोबल से उत्पन्न पयस्वनी व मां अनुसुइया के दस हजार सालों के तप का परिणाम मां मंदाकिनी के साथ ही प्रभु श्री राम के ग्यारह वर्ष छह माह और अठारह दिनों के लिये चित्रकूट प्रवास के दौरान उनकी सेवा के लिये अयोध्या से आई मां सरयू की त्रिवेणी आज भी यहां पर लोगों को आनंद देने के साथ ही पापों के भक्षण करने का काम कर रही है।
Tuesday, March 30, 2010
Sunday, March 28, 2010
जंगल में मंगल:एक कर्मयोगी की तप साधना
चित्रकूट। अब शायद ही उनका नाम कोई भरत दास के नाम से जानता हो क्योंकि धर्म और आध्यात्म के साथ पर्यावरण संतुलन को सुधारने जो बीड़ा उन्होंने बीस साल पहले उठाया था उसकी वजह से लोग उन्हें अब 'हरियाली वाले बाबा' के नाम से जानते हैं।
मानिक पुर कस्बे से लगभग सात किलोमीटर दूर काली घाटी में बाबा भरत दास ने रहना शुरु किया तो सहसा किसी ने विश्वास ही नही किया कि शायद इस बियावान जंगल में कोई एक रात भी रह पायेगा पर पथरीली जमीन की कोख से जब उन्होंने पौधों की कोंपलें निकलवायी तो जैसे आश्चर्य ही हो गया। लोगों ने समझा कि शायद बाबा मायावी है पर ऐसा कुछ भी नही था। लगभग तीन सौ से ज्यादा पेड़ों को पुष्पित और पल्लवित करने के पीछे बाबा की मेहनत की वह तासीर छिपी है जिसकी बदौलत आम तो क्या अन्य पेड़ अपने फल लोगों को खिला रहे हैं। इतना ही नही जब इलाके के असरदार लोगों की नजर इस जगह पर पड़ी तो फिर सामंतशाही अंदाज में व्यवस्था के लिये पूंछतांछ प्रारंभ हुई। लिहाजा बाबा ने स्थान बदल दिया और काली घाटी से एक किलोमीटर दूर जब पहुंचे तो वहां पर पानी के झरने देखकर प्रफुल्लित हो उठे। दो ही साल के अंतराल में बाबा ने वहां पर भी आंवला पीपल और अन्य पौधों को रोपकर उन्हें तैयार भी कर डाला।
बाबा भरत दास बताते हैं कि वे मूलत: कानपुर के नवाबगंज के गुरु निर्मलदास के शिष्य हैं। उनके गुरु जी कर्वी में बनकट के पास पम्प कैनाल के मंदिर में रहकर तप किया करते थे। लगभग बीस साल पहले वे गुरु की आज्ञा से काली घाटी आये। जब यहां पर आये तो सामने की कोल बस्ती के साथ ही सरैंया में रहने वाले लोगों का काफी साथ मिला। पेड़ पौधे मानव का मन प्रफुल्लित रखते और जीवन जीने में सहायता करते है, अपने गुरु की इस बात को अंगीकार कर पौधों का रोपण करने लगे और देखते ही देखते काली घाटी में हरियाली दिखाई देने लगी। आम के लगभग डेढ़ सौ पेड़ों के साथ ही महुवा, जामुन, नींबू, अमरुद, करौंदा, आंवला, अनार, आंस, सेधा, तेंदू, नीम, सिरसा व बेर जैसे तमाम पेड़ों में हरियाली दिखा दी। इसके साथ ही यहां पर लगे गुलाब, गेंदा आदि के पौधे भी अपना खूबसूरती कहानी स्वयं कहते हैं। वे बताते हैं कि पहले से मां काली, हनुमान जी, शंकर जी, भैरम बाबा की मूर्तियां थी वर्ष 2005 में स्थानीय लोगों के सहयोग से मां अम्बे की विशालकाय प्रतिमा की स्थापना कराई गई। इसके बाद जब इस स्थान पर वैभव दिखाई देने लगा तो कुछ दबंगों ने उन्हें परेशान करना प्रारंभ कर दिया तो वे स्थान को छोड़कर एक किलोमीटर आगे चले गये। वहां पर गुफा के साथ ही पहाड़ों के बीच से रिसता हुआ पानी देखा तो उत्साह चरम पर पहुंचा। यहां पर नर्मदा के किनारे से लाकर शिवलिंग व चित्रकूट से लाकर हनुमान जी की स्थापना की। यहां पर भी पीपल, बेल, आंवला के साथ ही पचासो किस्म के पौधे रोप डाले। फिर जनप्रतिनिधि और सरकारी स्तर पर प्रयास किया तो ब्लाक प्रमुख विनोद द्विवेदी व खंड विकास अधिकारी ने कई बार आकर स्थान को देखा। वे बताते हैं कि श्री द्विवेदी ने आश्वासन दिया है कि यहां पर निकलने वाले सभी जल स्रोतों को एक कर तालाब का रुप देने के साथ ही आगे पहाड़ पर ही बांध का निर्माण किया जायेगा। जिससे इस क्षेत्र में हरियाली की बयार और दिखाई देगी। बाबा भरत दास बताते हैं कि उन्होंने अब संकल्प लिया है कि काली घाटी से लेकर नये आश्रम तक सड़क के किनारे दोनो तरफ पौधों का रोपण कर सरकारी नुमाइंदो को दिखायेगे कि किस तरह से पौधों को तैयार किया जाता है। इसके लिये उन्होंने स्थानीय लोगों से भी बात करने की बात कही है। यह काम बिना किसी सरकारी सहयोग से किये जाने की बात करते हैं।
मानिक पुर कस्बे से लगभग सात किलोमीटर दूर काली घाटी में बाबा भरत दास ने रहना शुरु किया तो सहसा किसी ने विश्वास ही नही किया कि शायद इस बियावान जंगल में कोई एक रात भी रह पायेगा पर पथरीली जमीन की कोख से जब उन्होंने पौधों की कोंपलें निकलवायी तो जैसे आश्चर्य ही हो गया। लोगों ने समझा कि शायद बाबा मायावी है पर ऐसा कुछ भी नही था। लगभग तीन सौ से ज्यादा पेड़ों को पुष्पित और पल्लवित करने के पीछे बाबा की मेहनत की वह तासीर छिपी है जिसकी बदौलत आम तो क्या अन्य पेड़ अपने फल लोगों को खिला रहे हैं। इतना ही नही जब इलाके के असरदार लोगों की नजर इस जगह पर पड़ी तो फिर सामंतशाही अंदाज में व्यवस्था के लिये पूंछतांछ प्रारंभ हुई। लिहाजा बाबा ने स्थान बदल दिया और काली घाटी से एक किलोमीटर दूर जब पहुंचे तो वहां पर पानी के झरने देखकर प्रफुल्लित हो उठे। दो ही साल के अंतराल में बाबा ने वहां पर भी आंवला पीपल और अन्य पौधों को रोपकर उन्हें तैयार भी कर डाला।
बाबा भरत दास बताते हैं कि वे मूलत: कानपुर के नवाबगंज के गुरु निर्मलदास के शिष्य हैं। उनके गुरु जी कर्वी में बनकट के पास पम्प कैनाल के मंदिर में रहकर तप किया करते थे। लगभग बीस साल पहले वे गुरु की आज्ञा से काली घाटी आये। जब यहां पर आये तो सामने की कोल बस्ती के साथ ही सरैंया में रहने वाले लोगों का काफी साथ मिला। पेड़ पौधे मानव का मन प्रफुल्लित रखते और जीवन जीने में सहायता करते है, अपने गुरु की इस बात को अंगीकार कर पौधों का रोपण करने लगे और देखते ही देखते काली घाटी में हरियाली दिखाई देने लगी। आम के लगभग डेढ़ सौ पेड़ों के साथ ही महुवा, जामुन, नींबू, अमरुद, करौंदा, आंवला, अनार, आंस, सेधा, तेंदू, नीम, सिरसा व बेर जैसे तमाम पेड़ों में हरियाली दिखा दी। इसके साथ ही यहां पर लगे गुलाब, गेंदा आदि के पौधे भी अपना खूबसूरती कहानी स्वयं कहते हैं। वे बताते हैं कि पहले से मां काली, हनुमान जी, शंकर जी, भैरम बाबा की मूर्तियां थी वर्ष 2005 में स्थानीय लोगों के सहयोग से मां अम्बे की विशालकाय प्रतिमा की स्थापना कराई गई। इसके बाद जब इस स्थान पर वैभव दिखाई देने लगा तो कुछ दबंगों ने उन्हें परेशान करना प्रारंभ कर दिया तो वे स्थान को छोड़कर एक किलोमीटर आगे चले गये। वहां पर गुफा के साथ ही पहाड़ों के बीच से रिसता हुआ पानी देखा तो उत्साह चरम पर पहुंचा। यहां पर नर्मदा के किनारे से लाकर शिवलिंग व चित्रकूट से लाकर हनुमान जी की स्थापना की। यहां पर भी पीपल, बेल, आंवला के साथ ही पचासो किस्म के पौधे रोप डाले। फिर जनप्रतिनिधि और सरकारी स्तर पर प्रयास किया तो ब्लाक प्रमुख विनोद द्विवेदी व खंड विकास अधिकारी ने कई बार आकर स्थान को देखा। वे बताते हैं कि श्री द्विवेदी ने आश्वासन दिया है कि यहां पर निकलने वाले सभी जल स्रोतों को एक कर तालाब का रुप देने के साथ ही आगे पहाड़ पर ही बांध का निर्माण किया जायेगा। जिससे इस क्षेत्र में हरियाली की बयार और दिखाई देगी। बाबा भरत दास बताते हैं कि उन्होंने अब संकल्प लिया है कि काली घाटी से लेकर नये आश्रम तक सड़क के किनारे दोनो तरफ पौधों का रोपण कर सरकारी नुमाइंदो को दिखायेगे कि किस तरह से पौधों को तैयार किया जाता है। इसके लिये उन्होंने स्थानीय लोगों से भी बात करने की बात कही है। यह काम बिना किसी सरकारी सहयोग से किये जाने की बात करते हैं।
Sunday, February 28, 2010
Saturday, February 6, 2010
यू थ्री ए सम्मेलन: जोर शोर से चल रही हैं तैयारियां
चित्रकूट। महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय के प्रांगण में इन दिनों यू 3 ए सम्मेलन की तैयारियां जोर शोर से चल रही है। जहां एक तरफ देशी के साथ ही विदेशी मेहमानों के आने को लेकर उत्साह का माहौल है वहीं व्यवस्था समितियों के प्रभारी भी अपने-अपने कामों में जुटे दिखाई दे रहे हैं।
विवि. के कुलपति प्रो. ज्ञानेन्द्र सिंह की अध्यक्षता में आयोजित बैठक के बाद 8 फरवरी से लेकर 10 फरवरी तक आयोजित होने वाले सम्मेलन के सभी कार्यक्रमों की समय वार घोषणा कर दी। सम्मेलन संयोजक डा. आरसी सिंह ने बताया कि 8 फरवरी को प्रात: 11 बजे से दोपहर 1 बजे तक उद्घाटन सत्र होगा। इसके बाद माइंड एंड मैटर थीम पर तकनीकी सत्र तथा एक्ज्यूकेटिव कमेटी एवं जनरल बाड़ी की बैठक होगी। 9 फरवरी को टेक्नोलाजी थीम और होलिस्टिक हेल्थ थीम पर तकनीकी सत्र होंगे। इसके बाद यू 3 ए बैठक होगी। 8 व 9 की शाम को 6.30 बजे से सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे। 10 फरवरी को यू 3 ए स्टोरीज थीम पर तकनीकी सत्र एवं अपराह्न 12 बजे से समापन सत्र होगा। चित्रकूट के दर्शनीय स्थलों के अवलोकन के साथ ही रुरल यू 3 ए का गठन 10 फरवरी को मिनी खजुराहो 'गणेश बाग' कर्वी में किया जायेगा।
सम्मेलन के सचिव द्वय डा. वीरेन्द्र कुमार व्यास व डा. आशुतोष उपाध्याय ने बताया कि सम्मेलन में आने वाले प्रतिभागियों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। न्यूजीलैंड, स्काटलैंड, इंग्लैंड, साउथ अफ्रीका, सिंगापुर, नेपाल व बांग्लादेश आदि देशों से लगभग पचास व देश के तमाम राज्यों से लगभग 450 प्रतिभागियों के सम्मिलित होने की सूचना प्राप्त हो चुकी है। इस दौरान विवि परिसर में ग्राहक सेवा के तत्वावधान में ग्रामीण उत्पादों की प्रदर्शनी विभिन्न विकास एजेन्सियों द्वारा लगाई जायेगी।
विवि. के कुलपति प्रो. ज्ञानेन्द्र सिंह की अध्यक्षता में आयोजित बैठक के बाद 8 फरवरी से लेकर 10 फरवरी तक आयोजित होने वाले सम्मेलन के सभी कार्यक्रमों की समय वार घोषणा कर दी। सम्मेलन संयोजक डा. आरसी सिंह ने बताया कि 8 फरवरी को प्रात: 11 बजे से दोपहर 1 बजे तक उद्घाटन सत्र होगा। इसके बाद माइंड एंड मैटर थीम पर तकनीकी सत्र तथा एक्ज्यूकेटिव कमेटी एवं जनरल बाड़ी की बैठक होगी। 9 फरवरी को टेक्नोलाजी थीम और होलिस्टिक हेल्थ थीम पर तकनीकी सत्र होंगे। इसके बाद यू 3 ए बैठक होगी। 8 व 9 की शाम को 6.30 बजे से सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे। 10 फरवरी को यू 3 ए स्टोरीज थीम पर तकनीकी सत्र एवं अपराह्न 12 बजे से समापन सत्र होगा। चित्रकूट के दर्शनीय स्थलों के अवलोकन के साथ ही रुरल यू 3 ए का गठन 10 फरवरी को मिनी खजुराहो 'गणेश बाग' कर्वी में किया जायेगा।
सम्मेलन के सचिव द्वय डा. वीरेन्द्र कुमार व्यास व डा. आशुतोष उपाध्याय ने बताया कि सम्मेलन में आने वाले प्रतिभागियों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। न्यूजीलैंड, स्काटलैंड, इंग्लैंड, साउथ अफ्रीका, सिंगापुर, नेपाल व बांग्लादेश आदि देशों से लगभग पचास व देश के तमाम राज्यों से लगभग 450 प्रतिभागियों के सम्मिलित होने की सूचना प्राप्त हो चुकी है। इस दौरान विवि परिसर में ग्राहक सेवा के तत्वावधान में ग्रामीण उत्पादों की प्रदर्शनी विभिन्न विकास एजेन्सियों द्वारा लगाई जायेगी।
अगले साल तक जमीन पर काम कर सकती है चित्रकूट महायोजना
चित्रकूट। भले ही मप्र ने चित्रकूट को धार्मिक नगरी घोषित कर विकास की बड़ी कवायत करनी प्रारंभ कर दी हो पर इस मामले में यहां का प्रशासन भी काफी खामोशी से काम कर रहा है। जहां एक तरफ चीफ टाउन प्लानर को 'चित्रकूट महायोजना' को बनाये जाने का प्रस्ताव भेजा जा चुका है। वहीं मुख्यालय को एक विशेष रुप से शेप देने के साथ ही विशेष तौर पर विकासात्मक कदमों की भरमार करने की योजना भी बताई जा रही है।
अपर जिलाधिकारी राजा राम बताते हैं कि वैसे तो चित्रकूट महायोजना को बनाये जाने का प्रस्ताव काफी पहले भेजा गया था पर अब मालूम चला है कि यह अपने अंतिम दौर में है। लखनऊ के चीफ टाउन प्लानर के द्वारा बनाये जाने वाले चित्रकूट मुख्यालय के नक्शे के बारे में वे कहते हैं कि अभी तक तो उन्होंने यह देखा नही है पर उम्मीद है कि इसके बनने के बाद तो चित्रकूट विकास प्राधिकरण का काम काफी बढ़ जायेगा। जहां यहां पर नई टाउनशिप बनेगी वहीं नये पार्क व धार्मिक व ऐतिहासिक महत्व के स्थलों को संरक्षित करने के लिये भी विशेष कार्ययोजना का प्रस्ताव भी इसमें किया गया बताया जा रहा है।
इतना ही नही जहां प्रशासनिक स्तर पर अधिकारियों को यह उम्मीद है कि अगले वित्तीय वर्ष में चित्रकूट को भी मथुरा, काशी, इलाहाबाद, वृन्दावन की तर्ज पर महायोजना बनाकर विकसित किया जा रहा है। वैसी ही योजना की शुरुआत यहां पर शासन के स्तर पर अगले वर्ष हो सकती है। वैसे यहां पर भी अधिकारी अपने स्तर पर स्वयंसेवियों के साथ चित्रकूट के विकास की मशक्कत का काम कर रहे हैं।
अपर जिलाधिकारी राजा राम बताते हैं कि वैसे तो चित्रकूट महायोजना को बनाये जाने का प्रस्ताव काफी पहले भेजा गया था पर अब मालूम चला है कि यह अपने अंतिम दौर में है। लखनऊ के चीफ टाउन प्लानर के द्वारा बनाये जाने वाले चित्रकूट मुख्यालय के नक्शे के बारे में वे कहते हैं कि अभी तक तो उन्होंने यह देखा नही है पर उम्मीद है कि इसके बनने के बाद तो चित्रकूट विकास प्राधिकरण का काम काफी बढ़ जायेगा। जहां यहां पर नई टाउनशिप बनेगी वहीं नये पार्क व धार्मिक व ऐतिहासिक महत्व के स्थलों को संरक्षित करने के लिये भी विशेष कार्ययोजना का प्रस्ताव भी इसमें किया गया बताया जा रहा है।
इतना ही नही जहां प्रशासनिक स्तर पर अधिकारियों को यह उम्मीद है कि अगले वित्तीय वर्ष में चित्रकूट को भी मथुरा, काशी, इलाहाबाद, वृन्दावन की तर्ज पर महायोजना बनाकर विकसित किया जा रहा है। वैसी ही योजना की शुरुआत यहां पर शासन के स्तर पर अगले वर्ष हो सकती है। वैसे यहां पर भी अधिकारी अपने स्तर पर स्वयंसेवियों के साथ चित्रकूट के विकास की मशक्कत का काम कर रहे हैं।
मेले को यादगार बनाने को हर संभव प्रयास
चित्रकूट। समाजवादी चिंतक डा. राम मनोहर लोहिया द्वारा परिकल्पित राष्ट्रीय रामायण मेले को सैतीसवें वर्ष आयोजित करने के लिये तैयारियों को अंतिम रुप दिया जा रहा है।
तीर्थ नगरी के राष्ट्रीय रामायण मेला भवनम के लोहिया सभागार में मेले के कार्यकारी अध्यक्ष गोपाल कृष्ण करवरिया, मंत्री आचार्य बाबू लाल गर्ग, प्रचार मंत्री डा. करुणा शंकर द्विवेदी,डा.श्याम मोहन त्रिपाठी व देवी दयाल यादव ने पत्रकारों से बात करते हुये बताया कि राष्ट्रीय रामायण मेले का उद्घाटन 12 फरवरी को सूबे के श्रम मंत्री कुंवर बादशाह सिंह करेंगे।
उन्होंने बताया कि देश भर के रामायण के विद्वानों, कथाव्यासों, रंगकर्मियों व राजनेताओं के साथ ही राम लीला मंडलों व रामकथा की विभिन्न तरीकों से प्रस्तुतियां देने वाले दलों व कलाकारों को आमंत्रित किया गया था। अभी तक तमिलनाडु डा. एम शेषन, डा. सुन्दरम, आंध्रप्रदेश से डा. आर एस त्रिपाठी, डा. एन जी देवकी, उप्र से सूर्य प्रकाश दीक्षित, डा. जीतेन्द्र नाथ पांडेय, डा. यतीन्द्र त्रिपाठी, डा. चंद्रिका प्रसाद दीक्षित, डा. कामता कमलेश, डा. राम अवध शास्त्री हरियाणा से डा. ओम प्रकाश शर्मा आदि विद्वानों के आने की स्वीकृतियां मिल चुकी हैं। बिहार, झारखंड, मप्र, राजस्थान, दिल्ली आदि प्रदेशों से भी तमाम विद्वानों के आने की सूचनायें प्राप्त हो रही हैं। विभिन्न प्रांतों के सांस्कृतिक दलों व वृन्दावन की रास लीला सहित रास लीला, सृजन आर्ट एंड कल्चर नई दिल्ली का बैले ग्रुप, कलाकार डांस इन्टीट्यूट मुंबई, पूर्णिमा और सखियों का नृत्य, रत्नेश का गायन, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार के क्षेत्रीय निदेशालय का दल, पवन तिवारी निवाड़ी, रामाधीन आर्य एंड पार्टी मऊरानीपुर, जुगुल किशोर शर्मा लोक नृत्य, रघुवीर सिंह यादव लोकनृत्य झांसी, ललित त्रिपाठी गायन आदि कलाकारों के आने की स्वीकृतियां प्राप्त हो चुकी रहे हैं। इसके अतिरिक्त आकाशवाणी इलाहाबाद, छतरपुर, रींवा, श्री राम कला केंद्र नई दिल्ली, रमा वैद्यनाथन भरतनाट्यम आदि के आने की संभावना है।
आयोजकों ने बताया कि समारोह में जगद्गुरु शंकराचार्य बद्रिकाश्रम स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती, जगद्गुरु स्वामी राम भद्राचार्य, संत फलाहारी दास महाराज अयोध्या व चित्रकूट स्थित सभी अखाड़ों के संत महन्त मौजूद रहेंगे। राम कथा के व्यासों में स्वामी राजेश्वरानंद सरस्वती, गुप्तेश्वरी देवी, मानस मंजरी, रघुराज शरण, पुष्पा गौतम, मीरा दुबे, आदि के आने की स्वीकृतियां आ चुकी हैं। इसके साथ ही परिसर में लगने वाली प्रदर्शनियां भी आकर्षण का केंद्र रहेंगी। संस्कृति विभाग उप्र, सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग, केन्द्रीय हथकरघा विभाग, दीन दयाल शोध संस्थान सहित मंडल व जनपद के सभी विभागों की विकासात्मक कार्यो की प्रदर्शनियां लगाई जायेगी।
तीर्थ नगरी के राष्ट्रीय रामायण मेला भवनम के लोहिया सभागार में मेले के कार्यकारी अध्यक्ष गोपाल कृष्ण करवरिया, मंत्री आचार्य बाबू लाल गर्ग, प्रचार मंत्री डा. करुणा शंकर द्विवेदी,डा.श्याम मोहन त्रिपाठी व देवी दयाल यादव ने पत्रकारों से बात करते हुये बताया कि राष्ट्रीय रामायण मेले का उद्घाटन 12 फरवरी को सूबे के श्रम मंत्री कुंवर बादशाह सिंह करेंगे।
उन्होंने बताया कि देश भर के रामायण के विद्वानों, कथाव्यासों, रंगकर्मियों व राजनेताओं के साथ ही राम लीला मंडलों व रामकथा की विभिन्न तरीकों से प्रस्तुतियां देने वाले दलों व कलाकारों को आमंत्रित किया गया था। अभी तक तमिलनाडु डा. एम शेषन, डा. सुन्दरम, आंध्रप्रदेश से डा. आर एस त्रिपाठी, डा. एन जी देवकी, उप्र से सूर्य प्रकाश दीक्षित, डा. जीतेन्द्र नाथ पांडेय, डा. यतीन्द्र त्रिपाठी, डा. चंद्रिका प्रसाद दीक्षित, डा. कामता कमलेश, डा. राम अवध शास्त्री हरियाणा से डा. ओम प्रकाश शर्मा आदि विद्वानों के आने की स्वीकृतियां मिल चुकी हैं। बिहार, झारखंड, मप्र, राजस्थान, दिल्ली आदि प्रदेशों से भी तमाम विद्वानों के आने की सूचनायें प्राप्त हो रही हैं। विभिन्न प्रांतों के सांस्कृतिक दलों व वृन्दावन की रास लीला सहित रास लीला, सृजन आर्ट एंड कल्चर नई दिल्ली का बैले ग्रुप, कलाकार डांस इन्टीट्यूट मुंबई, पूर्णिमा और सखियों का नृत्य, रत्नेश का गायन, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार के क्षेत्रीय निदेशालय का दल, पवन तिवारी निवाड़ी, रामाधीन आर्य एंड पार्टी मऊरानीपुर, जुगुल किशोर शर्मा लोक नृत्य, रघुवीर सिंह यादव लोकनृत्य झांसी, ललित त्रिपाठी गायन आदि कलाकारों के आने की स्वीकृतियां प्राप्त हो चुकी रहे हैं। इसके अतिरिक्त आकाशवाणी इलाहाबाद, छतरपुर, रींवा, श्री राम कला केंद्र नई दिल्ली, रमा वैद्यनाथन भरतनाट्यम आदि के आने की संभावना है।
आयोजकों ने बताया कि समारोह में जगद्गुरु शंकराचार्य बद्रिकाश्रम स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती, जगद्गुरु स्वामी राम भद्राचार्य, संत फलाहारी दास महाराज अयोध्या व चित्रकूट स्थित सभी अखाड़ों के संत महन्त मौजूद रहेंगे। राम कथा के व्यासों में स्वामी राजेश्वरानंद सरस्वती, गुप्तेश्वरी देवी, मानस मंजरी, रघुराज शरण, पुष्पा गौतम, मीरा दुबे, आदि के आने की स्वीकृतियां आ चुकी हैं। इसके साथ ही परिसर में लगने वाली प्रदर्शनियां भी आकर्षण का केंद्र रहेंगी। संस्कृति विभाग उप्र, सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग, केन्द्रीय हथकरघा विभाग, दीन दयाल शोध संस्थान सहित मंडल व जनपद के सभी विभागों की विकासात्मक कार्यो की प्रदर्शनियां लगाई जायेगी।
Wednesday, February 3, 2010
सूखे से जंग जीत मुनव्वर बने धरती के लाल
चित्रकूट। मौसम की मार से परेशान बुंदेलखंड के न जाने कितने किसान पिछले सात सालों में सल्फास खाकर या फांसी लगाकर जान दे चुके हैं। पर इस तस्वीर से उलट एक ऐसा वीर किसान भी है जो भले ही कभी स्कूल न गया हो मगर उसके खेत कभी खाली नहीं रहे। फसलों में वो हमेशा अव्वल रहा।
कभी दूसरों के खेत को किराये पर लेकर खेती करने वाले जनपद के रामपुर तरौंहा गांव के 70 वर्षीय मुनव्वर अली कहते हैं कि उन्होंने जमीन में मेहनत करने को ही अल्लाह की इबारत माना और आज पचास बीघा खेती उसकी ही नियामत है। एक साल में तीन से चार फसलें पैदा करने और खेतों को कभी खाली न रखने वाले मुनव्वर अली उन किसानों के लिए मिसाल बन चुके हैं जो सूखे से परेशान हैं। वे जिले के एक मात्र ऐसे किसान भी हैं जिनके खेतों में पैदा होने वाले आलू इस जिले में बिकते ही नही बल्कि बाहर जाते हैं। इलाहाबाद में कोल्ड स्टोरेज में आलू रखने के बाद अच्छी कीमत में बेंचने की बात करने वाले श्री अली कहते हैं कि भइया तीस साल हो गये एक भी खेत कभी खाली नही रहा और ऐसी कोई फसल नही जो उन्होंने पैदा ही की। बताते हैं कि वे ही अपने ब्लाक के पहले किसान हैं जिसके खेत में पहली बार रिंग बोर से पानी निकला था। चार-चार ट्यूब बेलों के साथ ही खेती की सभी उन्नतशील तरीके ग्रहण किये। इस दौरान उनका साथ सभी अधिकारियों ने भी खूब दिया।
लगभग बीस बीघा खेत पर आलू की फसल दिखाते हुए उन्होंने कहाकि लगभग 800 क्विंटल आलू हो ही जायेगा। इस समय उनके खेतों में जहां गेंहू, चना, अरहर, सरसों की फसलें लहलहा रही हैं वहीं धनिया, मिर्च, प्याज, आलू, जीरा, बैगन, टमाटर व पालक भी अच्छी मात्रा में लगे दिखे। लगभग पचास लोगों के कुनबे के मुखिया श्री अली ने बताया कि रवी, खरीफ और जायद में तो फसलें वे सभी ले ही लेते हैं। इसके साथ ही जानवरों के लिये बरसीम को भी उगा लेते हैं।
उनकी खेती के तौर तरीके देखने पहुंचे उप निदेशक कृषि मो. आरिफ सिद्दीकी व जिला कृषि अधिकारी एच एन सिंह ने जब सवाल किया कि दवा और खाद का प्रयोग किस तरह और कौन सी कर रहे हैं तो उनका जवाब था कि वो जैविक खेती के हिमायती हैं पर समय की मांग के अनुसार थोड़ा बहुत रासायनिक खाद इस्तेमाल करते हैं। नये-नये प्रयोगों के शौकीन मुनव्वर अली कहते हैं कि एक बार नारियल, छुहारा व बादाम के पेड़ भी लगाये थे पर कामयाबी नहीं मिली। उन्होंने कहा कि अगर बुंदेली किसान अपनी मेहनत की ताकत को पहचान लें और अपनी मिट्टी में मेहनत करें तो उन्हें कमाने के लिए बाहर जाने की जरुरत नहीं है।
कभी दूसरों के खेत को किराये पर लेकर खेती करने वाले जनपद के रामपुर तरौंहा गांव के 70 वर्षीय मुनव्वर अली कहते हैं कि उन्होंने जमीन में मेहनत करने को ही अल्लाह की इबारत माना और आज पचास बीघा खेती उसकी ही नियामत है। एक साल में तीन से चार फसलें पैदा करने और खेतों को कभी खाली न रखने वाले मुनव्वर अली उन किसानों के लिए मिसाल बन चुके हैं जो सूखे से परेशान हैं। वे जिले के एक मात्र ऐसे किसान भी हैं जिनके खेतों में पैदा होने वाले आलू इस जिले में बिकते ही नही बल्कि बाहर जाते हैं। इलाहाबाद में कोल्ड स्टोरेज में आलू रखने के बाद अच्छी कीमत में बेंचने की बात करने वाले श्री अली कहते हैं कि भइया तीस साल हो गये एक भी खेत कभी खाली नही रहा और ऐसी कोई फसल नही जो उन्होंने पैदा ही की। बताते हैं कि वे ही अपने ब्लाक के पहले किसान हैं जिसके खेत में पहली बार रिंग बोर से पानी निकला था। चार-चार ट्यूब बेलों के साथ ही खेती की सभी उन्नतशील तरीके ग्रहण किये। इस दौरान उनका साथ सभी अधिकारियों ने भी खूब दिया।
लगभग बीस बीघा खेत पर आलू की फसल दिखाते हुए उन्होंने कहाकि लगभग 800 क्विंटल आलू हो ही जायेगा। इस समय उनके खेतों में जहां गेंहू, चना, अरहर, सरसों की फसलें लहलहा रही हैं वहीं धनिया, मिर्च, प्याज, आलू, जीरा, बैगन, टमाटर व पालक भी अच्छी मात्रा में लगे दिखे। लगभग पचास लोगों के कुनबे के मुखिया श्री अली ने बताया कि रवी, खरीफ और जायद में तो फसलें वे सभी ले ही लेते हैं। इसके साथ ही जानवरों के लिये बरसीम को भी उगा लेते हैं।
उनकी खेती के तौर तरीके देखने पहुंचे उप निदेशक कृषि मो. आरिफ सिद्दीकी व जिला कृषि अधिकारी एच एन सिंह ने जब सवाल किया कि दवा और खाद का प्रयोग किस तरह और कौन सी कर रहे हैं तो उनका जवाब था कि वो जैविक खेती के हिमायती हैं पर समय की मांग के अनुसार थोड़ा बहुत रासायनिक खाद इस्तेमाल करते हैं। नये-नये प्रयोगों के शौकीन मुनव्वर अली कहते हैं कि एक बार नारियल, छुहारा व बादाम के पेड़ भी लगाये थे पर कामयाबी नहीं मिली। उन्होंने कहा कि अगर बुंदेली किसान अपनी मेहनत की ताकत को पहचान लें और अपनी मिट्टी में मेहनत करें तो उन्हें कमाने के लिए बाहर जाने की जरुरत नहीं है।
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