विकास का लाकडाउन और समाज शिल्पियों का क्रंदन
चित्रकूट का संदर्भ अक्सर आम लोगों के साथ विद्वान भी - "चित्रकूट के घाट में भई संतन की भीर। तुलसीदास चंदन घिसैं तिलक देत रघुवीर॥" देकर सिध्द करने का प्रयास करते है। वास्तव में रामघाट मन्दाकिनी नदी के किनारे है,और मन्दाकिनी को एक दर्जन छोटी नदियां, नाले व प्रपात 80 किमी बहने लायक बनाते है। राजापुर के पास मोहना घाट पर यह नदी सतयुग से लेकर अब तक की संस्कृति व सभ्यता यमुना को सौप देती है। यही यमुना आगे बढ़कर प्रयागराज में खुद को गंगा को समर्पित कर देती है। अब अगर इस अजब गठजोड़ को कुछ इस अंदाज में देखे कि समय एक बार फिर अपने आपको दोहराता है यानी सतयुग की वो पयस्वनी जिसे परमपिता ब्रह्मा ने श्री हरि विष्णु के पाद प्रक्षालन से प्रकट की,सरयू वो जो श्री राम के नेत्रों से निकली, गोदावरी यहाँ गुप्त रूप में आई तो नर्मदा ने अपने आपको स्वयं मन्दाकिनी को झूरी के रूप में समर्पित कर दिया और सबसे प्रमुख मन्दाकिनी जो महासती अनुसुईया के तपबल के कारण स्वर्ग से आकर खुद यहां पर हमेशा रहने का निश्चय किया। लेकिन कहीं यह कहानी बनकर न रह जाये,क्योकि पिछले कुछ सालों से चित्रकूट में न केवल पयस्वनी और सरयू क...