चित्रकूट, संवाददाता: एक दृष्टिहीन अपने रास्ते जा रहा है सामने एक खंभा है। अस्थि विकलांग, मूकबधिर एक साथ दौड़ लगा देते हैं। दृष्टिहीन को संभालते और आगे का सही रास्ता बता देते हैं। ऐसे दृश्य जगदगुरु राम भद्राचार्य विकलांग विश्व विद्यालय में आम हैं। भले ही ये आम लोगों के लिये दया का पात्र हों पर यहां पर की जाने वाली दया को सहानुभूति का नाम नही दिया जा सकता, वास्तव में यह समानुभूति है। क्योंकि एक ही बीमारी के बीमार तो यहां पर सभी हैं। किसी को दिखाई नही देता तो किसी को सुनाई नही देता तो कोई पैरों से लाचार तो कोई हाथों से लाचार।
कहीं रीता गिर न जाये, कहीं गौरव की सायकिल पलट न जाये। ऐसे जुमले यहां पर आम हैं। भले ही जगदगुरु स्वामी राम भद्राचार्य सार्वजनिक रूप से कहते रहे हों कि उनको छात्रों को दया का पात्र न समझा जाये पर हर दिन यहां का नजारा कुछ और होता है। विवि के भोजनालय तुष्टि में तो नजारा कुछ अलग ही होता है यहां पर अधिकतर छात्र गु्रप में ही जाते हैं और इनमें भी अगर दो दृष्टिहीन हैं तो दो अस्थि विकलांग या मूक बधिर।
सचिव डा. गीता देवी कहती हैं कि वास्तव में इनको दूसरों की मदद के लिये किसी ने कहा नहीं है। अंत:प्रेरणा से ही यह एक दूसरे की खूब मदद करते हैं। उन्होंने कहा कि किसी दूसरे के पैरों का कांटा निकालकर देखो तो तुम्हें अपने पैरों में कांटे की चुभन महसूस होगी। कुछ इसी प्रकार से यह एक दूसरे की मदद करते हैं।
एक ऐसा स्थान जो विश्व भर के लोगो के लिये किंवदंतियों कथाओं कथानकों के साथ ही यथार्थ चेतना का पुंज बना हुआ है। प्रजापति ब्रह़मा के तपोबल से उत्पन्न पयस्वनी व मां अनुसुइया के दस हजार सालों के तप का परिणाम मां मंदाकिनी के साथ ही प्रभु श्री राम के ग्यारह वर्ष छह माह और अठारह दिनों के लिये चित्रकूट प्रवास के दौरान उनकी सेवा के लिये अयोध्या से आई मां सरयू की त्रिवेणी आज भी यहां पर लोगों को आनंद देने के साथ ही पापों के भक्षण करने का काम कर रही है।
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